क्या देश में मोदी विरोधी लहर की शुरुआत हो चुकी है? आज चुनाव हों तो तस्वीर क्या कहती है?
नरेंद्र मोदी ने 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में सरकार की कमान संभाली थी। इसके बाद गुजरात के मुख्यमंत्री और वर्ष 2014 से भारत के प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने 25 वर्षों तक लगातार सरकार के मुखिया के रूप में सार्वजनिक जीवन में अपनी राजनीतिक यात्रा जारी रखी। 7 अक्टूबर 2026 को यह यात्रा 25 वर्ष पूरे करने के ऐतिहासिक पड़ाव पर पहुंची।
भारतीय राजनीति में यह असाधारण निरंतरता अपने आप में महत्वपूर्ण है। सत्ता पक्ष इसे नेतृत्व, विकास, प्रशासन और जनविश्वास की उपलब्धि के रूप में देख रहा है, जबकि विपक्ष इसी दौर में चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता, मतदाता सूची और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से जुड़े सवालों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला रहा है।
यही विरोधाभास नरेंद्र मोदी के 25वें वर्ष की राजनीति को खास बनाता है। सवाल अब केवल यह नहीं है कि मोदी कितने लोकप्रिय हैं या विपक्ष कितना मजबूत है। बड़ा सवाल यह भी है कि जनता के बीच सरकार, चुनावी संस्थाओं और लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर भरोसे की स्थिति क्या है।
चुनाव आयोग पर टकराव ने बढ़ाई राजनीतिक गर्मी
6 अक्टूबर 2026 को INDIA ब्लॉक के सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े मुद्दों को लेकर चुनाव आयोग की ओर मार्च किया। प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई, धरना और हिरासत का घटनाक्रम सामने आया। विपक्ष ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाए।
विपक्ष का तर्क है कि मतदाता सूची में गलत तरीके से नाम हटाए जाने की आशंका सीधे नागरिकों के मतदान अधिकार से जुड़ी है। दूसरी ओर भाजपा और चुनाव आयोग ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है। इसलिए यहां एक महत्वपूर्ण अंतर बनाए रखना जरूरी है—चुनाव आयोग पर सवाल उठना और चुनाव में गड़बड़ी सिद्ध हो जाना एक ही बात नहीं है।
लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता पर बहस होना स्वाभाविक है, लेकिन ऐसी बहस का आधार प्रमाण, पारदर्शिता और तथ्य होना भी उतना ही आवश्यक है। यही कारण है कि आने वाले समय में SIR और चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी बहस भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बनी रह सकती है।
क्या यह मोदी विरोधी लहर है?
यह सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है, लेकिन उपलब्ध आंकड़े अभी इस सवाल का सीधा उत्तर नहीं देते।
अगस्त 2026 के इंडिया टुडे-CVoter Mood of the Nation सर्वेक्षण में नरेंद्र मोदी 48.7 प्रतिशत समर्थन के साथ प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे पसंदीदा विकल्प रहे। जनवरी 2026 के मुकाबले उनके समर्थन में कमी दर्ज हुई। राहुल गांधी 27.1 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रहे, जबकि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और TVK प्रमुख विजय 9.2 प्रतिशत के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
इस आंकड़े का महत्व इसलिए है क्योंकि मोदी का व्यक्तिगत समर्थन घटा जरूर है, लेकिन उसका पूरा लाभ राहुल गांधी को मिलता हुआ दिखाई नहीं देता। इसका अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि मोदी के खिलाफ कोई लहर नहीं है, लेकिन इसे तत्काल व्यापक ‘मोदी विरोधी लहर’ का प्रमाण भी नहीं माना जा सकता।
राजनीतिक माहौल में बदलाव और चुनावी लहर—दोनों अलग-अलग चीजें हैं। किसी नेता की लोकप्रियता में गिरावट असंतोष का संकेत हो सकती है, लेकिन चुनावी परिणाम तय करने के लिए क्षेत्रीय समीकरण, गठबंधन, उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे और मतदान व्यवहार भी निर्णायक होते हैं।
आज चुनाव हों तो क्या संकेत मिलते हैं?
इंडिया टुडे-CVoter के अगस्त 2026 Mood of the Nation सर्वेक्षण में यदि उस समय लोकसभा चुनाव होते तो NDA को 326 सीटों का अनुमान दिया गया था। भाजपा के लिए 261 और INDIA गठबंधन के लिए 185 सीटों का अनुमान था। सर्वेक्षण में NDA का वोट शेयर 45 प्रतिशत और INDIA गठबंधन का 39 प्रतिशत बताया गया।
इन आंकड़ों को चुनाव परिणाम की भविष्यवाणी के रूप में नहीं, बल्कि उस समय के जनमत संकेतक के रूप में देखना चाहिए। यह सर्वेक्षण 1 जुलाई से 25 अगस्त 2026 के बीच 25,184 लोगों से सीधे बातचीत और CVoter के पिछले छह महीनों के 91,795 ट्रैकिंग इंटरव्यू पर आधारित था। वास्तविक चुनाव अभी दूर हैं, इसलिए राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव इन आंकड़ों को काफी बदल सकता है।
फिर भी इन आंकड़ों से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत जरूर मिलता है—मोदी और भाजपा के समर्थन में कुछ कमी दिखाई दे रही है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर NDA के लिए बहुमत का समर्थन सर्वेक्षण में बना हुआ है।
अर्थव्यवस्था पर भरोसा, रोजगार सबसे बड़ी चिंता
राजनीतिक जनमत को केवल चुनावी नारों से समझना मुश्किल है। जनता के आर्थिक अनुभव भी राजनीतिक भविष्य को प्रभावित करते हैं।
सितंबर 2026 के Ipsos ‘What Worries the World’ सर्वेक्षण में भारत के करीब सात में दस लोगों ने देश को सही दिशा में जाते हुए माना, जबकि 79 प्रतिशत ने मौजूदा आर्थिक स्थिति को सकारात्मक बताया। इसके बावजूद रोजगार भारत की प्रमुख चिंता के रूप में सामने आया।
सितंबर में शहरी भारतीय उपभोक्ता विश्वास सूचकांक भी बढ़ा और 66.9 पर पहुंच गया, जो अगस्त के 65.3 से ऊपर था। Ipsos के मुताबिक उपभोक्ताओं के बीच घरेलू वित्तीय स्थिति और रोजगार की संभावनाओं को लेकर धारणा में सुधार भी देखा गया।
यानी भारतीय मतदाता की मनोदशा एकरेखीय नहीं है। कोई व्यक्ति देश की आर्थिक दिशा को लेकर आशावादी हो सकता है, लेकिन उसी समय अपने परिवार की नौकरी, आय, महंगाई और भविष्य को लेकर चिंतित भी हो सकता है।
यही वह जगह है जहां सरकार की विकास-कथा और आम नागरिक की रोजमर्रा की जिंदगी का संबंध महत्वपूर्ण हो जाता है।
मोदी की असली राजनीतिक परीक्षा
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सबसे बड़ी ताकत उनका व्यक्तिगत राजनीतिक जुड़ाव और राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान है। लेकिन 25 वर्ष के पड़ाव पर उनके सामने चुनौती भी बदलती हुई दिखाई देती है।
सवाल अब केवल बड़े बुनियादी ढांचे, डिजिटल अर्थव्यवस्था, वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका या विकास योजनाओं का नहीं है। सवाल यह भी है कि इन उपलब्धियों का प्रभाव आम नागरिक को रोजगार, आय, अवसर, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा के रूप में कितना महसूस होता है।
विशेष रूप से युवाओं की आकांक्षाएं आने वाले वर्षों की राजनीति को प्रभावित कर सकती हैं। रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, अवसर और संस्थागत विश्वसनीयता जैसे मुद्दे नई पीढ़ी के राजनीतिक व्यवहार में महत्व हासिल कर रहे हैं।
इसी पृष्ठभूमि में नए युवा राजनीतिक आंदोलनों और डिजिटल राजनीति का उभार भी ध्यान खींचता है। हालांकि किसी एक आंदोलन की डिजिटल मौजूदगी को पूरे देश की राजनीतिक राय मान लेना उचित नहीं होगा।
सोशल मीडिया का शोर और जनता की वास्तविक राय
राहुल गांधी के हालिया प्रदर्शन से जुड़े वीडियो और बयान सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हुए। समर्थकों ने इसे राजनीतिक संघर्ष के रूप में देखा, जबकि विरोधियों ने इसे अलग नजरिए से पेश किया।
लेकिन सोशल मीडिया को जनमत का पूर्ण प्रतिनिधि मानना जोखिम भरा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय और मुखर समूह किसी मुद्दे को उसकी वास्तविक जनसंख्या हिस्सेदारी से कहीं अधिक बड़ा दिखा सकते हैं।
इसलिए राजनीतिक विश्लेषण में सोशल मीडिया की चर्चा महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन उसे सर्वेक्षणों, चुनाव परिणामों और व्यापक सामाजिक-आर्थिक संकेतकों के साथ ही पढ़ा जाना चाहिए।
संस्थाओं पर भरोसा सबसे अहम सवाल
मोदी सरकार के 25 वर्ष पूरे होने के समय भारतीय राजनीति का एक बड़ा सवाल यही है कि सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक संघर्ष कितना भी तीखा क्यों न हो, संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जनता का भरोसा कैसे कायम रखा जाए।
विपक्ष यदि चुनाव आयोग पर सवाल उठाता है तो उसे प्रमाण और तथ्य सामने रखने होंगे। वहीं चुनाव आयोग और सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। मतदाता सूची जैसी प्रक्रिया में पारदर्शिता, स्पष्ट जानकारी और शिकायतों के समाधान की व्यवस्था जनता के विश्वास को मजबूत कर सकती है।
लोकतंत्र में चुनाव केवल सरकार बनाने की प्रक्रिया नहीं है; यह जनता के विश्वास की सबसे बड़ी संस्थागत अभिव्यक्ति है।
25 वर्ष पूरे, अब आगे की चुनौती
नरेंद्र मोदी के 25 वर्ष का राजनीतिक सफर निश्चित रूप से भारतीय लोकतंत्र की महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाएगा। लेकिन किसी भी लंबे राजनीतिक दौर का मूल्यांकन केवल उसके अतीत से नहीं, बल्कि उसके अगले चरण की चुनौतियों से भी होता है।
आज उपलब्ध जनमत संकेतक बताते हैं कि मोदी की राजनीतिक पकड़ कमजोर होकर समाप्त नहीं हुई है। साथ ही यह भी दिखाई देता है कि उनके समर्थन में कुछ बदलाव आए हैं और रोजगार, युवा आकांक्षाएं तथा संस्थाओं की विश्वसनीयता जैसे मुद्दे राजनीतिक दबाव बढ़ा सकते हैं। अगस्त के Mood of the Nation सर्वेक्षण में मोदी की प्रधानमंत्री पद की पसंद 48.7 प्रतिशत रही, जबकि जनवरी के मुकाबले इसमें गिरावट दर्ज हुई।
इसलिए वर्तमान राजनीतिक स्थिति को न तो सीधे ‘मोदी विरोधी लहर’ कहना उचित होगा और न ही जनता के भीतर मौजूद असंतोष और सवालों को नजरअंदाज किया जा सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर 2047 तक विकसित और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को दोहराया है और ‘वी विल डू इट’ का संकल्प व्यक्त किया है।
अब आने वाले वर्षों की कसौटी यही होगी कि विकास का दावा कितनी मजबूती से रोजगार और अवसर में बदलता है, लोकतांत्रिक संस्थाओं का भरोसा कितना मजबूत रहता है और सरकार जनता की बदलती आकांक्षाओं का कितना प्रभावी जवाब देती है।
25 वर्ष सत्ता के शीर्ष पर बने रहना इतिहास है, लेकिन इतिहास की असली परीक्षा यह है कि वह आने वाले भारत की दिशा को कितना प्रभावित करता है। नरेंद्र मोदी के लिए 25वें वर्ष के बाद की सबसे बड़ी चुनौती शायद यही है—उपलब्धियों के साथ जनविश्वास को भी लगातार मजबूत बनाए रखना।
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