व्यंग्य: खुश करना नहीं, पुश करना जरूरी!
चयनकर्ताओं के फैसले, खिलाड़ियों का प्रदर्शन और आलोचनाओं की कसौटी
खेल की दुनिया भी बड़ी निराली है। यहां खिलाड़ी बल्ले से रन बनाते हैं और चयनकर्ता अपने फैसलों से सुर्खियां बटोरते हैं। कभी प्रतिभाशाली खिलाड़ी टीम से बाहर हो जाता है, तो कभी लगातार असफलताओं के बावजूद किसी खिलाड़ी को मौके मिलते रहते हैं। जब इन फैसलों पर सवाल उठते हैं, तो सिद्धांतों की ऐसी बारिश होती है कि आलोचक भी सोचने पर मजबूर हो जाते हैं।
आजकल अकड़भरे संवादों का दौर है। कोई आलोचना कर दे, तो जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति को अंदर तक चोट लग जाती है। फिर ऐसा जवाब दिया जाता है, जिससे आलोचकों का मुंह बंद किया जा सके। क्रिकेट में मैदान के भीतर जितने दर्शक होते हैं, उससे कहीं ज्यादा लोग बाहर बैठकर खेल देखते हैं। ऐसे में जब शानदार फॉर्म में चल रहे खिलाड़ी को टीम में जगह नहीं मिलती, तो सोशल मीडिया पर आलोचनाओं का तूफान उठना स्वाभाविक है।
लंबे समय से आलोचनाओं का सामना कर रहे एक जिम्मेदार व्यक्ति ने जवाब दिया कि उनका काम सबको खुश रखना नहीं, बल्कि सही फैसले लेना है। यानी खुश करने से ज्यादा जरूरी है सही जगह पुश करना! बात में दम तो है। कोई चोटिल होगा, किसी की तबीयत खराब होगी या किसी के सामने घरेलू समस्या होगी, तभी तो दूसरे खिलाड़ी को अवसर मिलेगा। जिम्मेदारी का अर्थ लोकप्रियता के पीछे भागना नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लेना है।
लेकिन असली सवाल यही है कि सही फैसला तय कौन करेगा? फैसला लेने वाला स्वयं या मैदान पर अपने प्रदर्शन से योग्यता साबित करने वाला खिलाड़ी?
हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। कमी शायद उन्हें पहचानने और पर्याप्त अवसर देने की है। किसी खिलाड़ी को एक-दो मुकाबलों में ही कसौटी पर कस दिया जाता है, जबकि किसी को लगातार असफल होने के बाद भी उम्मीदों की ऑक्सीजन मिलती रहती है। चयन का तराजू कभी-कभी ऐसा नजर आता है, जिसमें प्रदर्शन से ज्यादा दूसरे समीकरणों का वजन दिखाई देता है।
ड्रेसिंग रूम में सुरक्षा, आत्मविश्वास और अनुशासन जरूरी हैं, लेकिन अनुशासन के नाम पर सवाल पूछने की आजादी खत्म नहीं होनी चाहिए। आलोचना को दुश्मनी समझना भी उचित नहीं है। स्वस्थ आलोचना व्यवस्था को बेहतर बनाने का अवसर देती है।
लोकप्रियता के पीछे भागना गलत है, लेकिन जनता की भावनाओं को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी समझदारी नहीं। खेल जनता के लिए भी है, केवल निर्णय लेने वालों की प्रतिष्ठा के लिए नहीं। प्रशंसक खिलाड़ियों के प्रदर्शन के आधार पर उम्मीदें पालते हैं और चयन में निष्पक्षता की अपेक्षा रखते हैं।
अब देखना यह है कि आने वाले मुकाबलों में फैसले सही साबित होते हैं या सही फैसलों को सही साबित करने के लिए नए-नए तर्क गढ़े जाते हैं। क्योंकि खेल में असली जवाब प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं, स्कोरबोर्ड देता है! जीत का सिलसिला बना रहेगा, तभी जिम्मेदारी पर भरोसे की प्रीत भी बनी रहेगी।
संजय एम. तराणेकर
कवि, लेखक व समीक्षक
31, संजय नगर, इन्दौर–452011
मध्य प्रदेश
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