कुशीनगर में विद्यार्थियों की होगी रॉकेट बनाने की अग्निपरीक्षा
कुशीनगर,✍️ राष्ट्र की परम्परा । अब अंतरिक्ष में उड़ान भरने के सपने सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहेंगे। विद्यार्थी खुद रॉकेट तैयार करेंगे, उपग्रह जैसी तकनीक विकसित करेंगे और अपने बनाए मॉडल को लॉन्च करने का व्यावहारिक अनुभव हासिल करेंगे। विज्ञान, तकनीक और नवाचार का ऐसा ही रोमांचक संगम कुशीनगर के पिपराघाट में देखने को मिलेगा, जहां 31 अक्टूबर से 3 नवंबर तक इन-स्पेस नारायणी रॉकेट्री कप का आयोजन किया जा रहा है। इस राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में देशभर की 76 टीमें अपनी तकनीकी प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगी।
देवरिया लोकसभा क्षेत्र के सांसद शशांक मणि की पहल पर आयोजित इस प्रतियोगिता में श्री नारायणी साइंस डेवलपमेंट फाउंडेशन (एसएसडीएफ), भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (इन-स्पेस) और इसरो की भूमिका बताई गई है। प्रतियोगिता के दौरान मॉडल रॉकेट और कैनसैट लॉन्च किए जाएंगे। इसका मकसद विद्यार्थियों को अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया से जोड़ना और उन्हें तकनीक को केवल पढ़ने के बजाय खुद बनाकर समझने का अवसर देना है।
इस आयोजन का सबसे रोमांचक हिस्सा मॉडल रॉकेट्री होगा। विद्यार्थियों को ऐसा मॉडल रॉकेट तैयार करना है, जो करीब एक किलोमीटर की ऊंचाई तक एक किलोग्राम का पेलोड ले जाने में सक्षम हो। लेकिन चुनौती केवल रॉकेट को आसमान में भेजने तक सीमित नहीं रहेगी। रॉकेट की उड़ान स्थिर रखना, पेलोड को सुरक्षित तरीके से अलग करना और उसके बाद उसकी रिकवरी सुनिश्चित करना भी तकनीकी दक्षता की परीक्षा होगी। यानी विद्यार्थियों को डिजाइन से लेकर निर्माण, परीक्षण और प्रक्षेपण तक अपनी समझ का परिचय देना होगा।
कैनसैट भी प्रतियोगिता का प्रमुख आकर्षण रहेगा। यह छोटे उपग्रह जैसी प्रणालियों का एक शैक्षणिक मॉडल होता है, जिसके जरिए विद्यार्थी सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक्स, डेटा संग्रह और संचार जैसी तकनीकों को समझ सकते हैं। इस बार कैनसैट को ड्रोन की मदद से लॉन्च किया जाएगा। इससे प्रतिभागियों को वास्तविक अंतरिक्ष अभियानों में इस्तेमाल होने वाली कुछ तकनीकी अवधारणाओं को करीब से समझने का अवसर मिलेगा।
इस प्रतियोगिता में विद्यार्थियों की परीक्षा केवल उनकी बनाई मशीनों से नहीं, बल्कि उनकी वैज्ञानिक सोच और समस्या सुलझाने की क्षमता से भी होगी। रॉकेट और कैनसैट तैयार करने के दौरान गणित, भौतिकी, इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार से जुड़ी जानकारियों का इस्तेमाल करना होगा। डिजाइन में गलती मिलने पर सुधार करना, परीक्षण के नतीजों का विश्लेषण करना और टीम के साथ मिलकर समाधान निकालना भी इस सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा होगा।
अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की बढ़ती गतिविधियों के बीच ऐसे आयोजन विद्यार्थियों को भविष्य की तकनीकों से जोड़ने का माध्यम बन सकते हैं। इससे उन्हें इंजीनियरिंग, एयरोस्पेस, रोबोटिक्स और उपग्रह तकनीक जैसे क्षेत्रों में करियर की संभावनाओं को समझने में मदद मिलेगी। पिपराघाट में होने वाला यह आयोजन कुशीनगर को भी विज्ञान और नवाचार से जुड़ी राष्ट्रीय गतिविधियों के केंद्र में लाने का अवसर प्रदान करेगा।
सांसद शशांक मणि ने कहा, “हमारा प्रयास है कि विद्यार्थी अंतरिक्ष विज्ञान को केवल पाठ्यक्रम के विषय के रूप में न देखें, बल्कि रॉकेट और उपग्रह जैसी प्रणालियों को खुद तैयार करने और उनके काम करने की प्रक्रिया को समझें। इस तरह का व्यावहारिक अनुभव उनमें वैज्ञानिक सोच और तकनीकी कौशल विकसित करने में मदद करेगा।”
कुल मिलाकर, पिपराघाट में होने जा रहा यह आयोजन विद्यार्थियों के लिए अपनी कल्पनाओं को तकनीकी रूप देने और अंतरिक्ष विज्ञान की बारीकियां सीखने का बड़ा मंच बनेगा। अब देखना दिलचस्प होगा कि देशभर से पहुंच रहीं 76 टीमें अपने नवाचार, तकनीकी कौशल और मेहनत से किस तरह अपनी पहचान बनाती हैं।
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