कसया के शिक्षा विभाग में कथित वसूली का मामला गरमाया! खेलकूद, ऑडिट और एमडीएम रजिस्टर पर उठे सवाल
प्रवीन यादव की रिपोर्ट
कुशीनगर (राष्ट्र की परम्परा)। योगी सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर जोर दे रही है, लेकिन कुशीनगर के कसया ब्लॉक में बेसिक शिक्षा विभाग के एक अधिकारी के खिलाफ सामने आए कथित वसूली के आरोपों ने विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। खेलकूद प्रतियोगिता के नाम पर विद्यालयों से 700 से 1,000 रुपये तक लेने, ऑडिट के नाम पर धनराशि वसूलने, 350 रुपये में मध्याह्न भोजन (एमडीएम) रजिस्टर बेचने और निरीक्षण की आड़ में शिक्षकों पर दबाव बनाने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। विद्यालय भवन निर्माण में ठेकेदारों की भूमिका और एक शिक्षिका को कथित तौर पर डराने-धमकाने के आरोप भी शिकायत का हिस्सा हैं।
शिकायतकर्ता ने कसया के खंड शिक्षा अधिकारी अशोक कुमार यादव के विरुद्ध अपर मुख्य सचिव, बेसिक शिक्षा से लेकर जिलाधिकारी कुशीनगर तक प्रार्थना पत्र भेजकर मजिस्ट्रेटी जांच और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की मांग की है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना और संबंधित अधिकारी का पक्ष सामने आना अभी बाकी है।
खेलकूद प्रतियोगिता के नाम पर कितनी रकम, किस आदेश से?
शिकायती पत्र के मुताबिक, कंपोजिट विद्यालयों से खेलकूद प्रतियोगिता के नाम पर 1,000 रुपये और प्राथमिक विद्यालयों से 700 रुपये तक लिए जाने का आरोप है। यदि ऐसा हुआ है, तो सबसे अहम सवाल यही है कि धनराशि किस अधिकृत आदेश के तहत ली गई? क्या विद्यालयों को रसीद दी गई? रकम किस मद में जमा हुई और उसका हिसाब विभागीय अभिलेखों में दर्ज है या नहीं?
बच्चों की प्रतिभा निखारने के लिए आयोजित होने वाली प्रतियोगिताओं का उद्देश्य शिक्षा और खेल को बढ़ावा देना है। ऐसे में विद्यालयों से कथित धन वसूली के आरोपों की जांच जरूरी है, ताकि वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।
निरीक्षण आख्या रोककर दबाव बनाने का आरोप
शिकायतकर्ता का आरोप है कि विद्यालयों के निरीक्षण के बाद खंड शिक्षा अधिकारी की ओर से जांच आख्या करीब एक महीने तक रोकी जाती है। आरोप यह भी है कि इस दौरान शिक्षकों पर कथित रूप से धन देने का दबाव बनाया जाता है और मांग पूरी नहीं होने पर रिपोर्ट जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय भेज दी जाती है।
यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं, तो विभागीय निरीक्षण की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठेंगे। किन विद्यालयों की रिपोर्ट लंबित रही, निरीक्षण और रिपोर्ट भेजने के बीच कितना अंतर रहा तथा देरी का वास्तविक कारण क्या था—इन बिंदुओं की जांच संबंधित अभिलेखों और शिक्षकों के बयानों के आधार पर की जा सकती है।
ऑडिट के नाम पर धन लेने का दावा, रसीद और हिसाब पर सवाल
शिकायत में कार्यालय सहायक चैतन्य मणि के माध्यम से भी विद्यालयों से ऑडिट के नाम पर कथित रूप से धन लिए जाने का आरोप लगाया गया है। शिकायतकर्ता के मुताबिक, कंपोजिट विद्यालयों से 1,000 रुपये और अन्य विद्यालयों से 500 रुपये तक लिए गए।
इस आरोप की सच्चाई सामने लाने के लिए यह जांचना जरूरी होगा कि धनराशि लेने का कोई विभागीय आदेश था या नहीं, भुगतान किसे किया गया, रसीद जारी हुई या नहीं और संबंधित रकम का लेखा-जोखा कहां दर्ज है। जांच से ही स्पष्ट होगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है।
350 रुपये में एमडीएम रजिस्टर बेचने का आरोप
शिकायती पत्र में बीआरसी कार्यालय में मध्याह्न भोजन यानी एमडीएम रजिस्टर 350 रुपये की दर से बेचे जाने का भी आरोप लगाया गया है। इस मामले में रजिस्टर की खरीद, आपूर्ति और वितरण की अधिकृत प्रक्रिया स्पष्ट होना जरूरी है। क्या रजिस्टर की कोई निर्धारित कीमत थी? यदि विद्यालयों से रकम ली गई, तो उसकी रसीद और भुगतान का रिकॉर्ड कहां है? रजिस्टर किसके माध्यम से उपलब्ध कराए गए?
इन सवालों का जवाब विभागीय रिकॉर्ड और संबंधित दस्तावेजों की जांच से ही सामने आ सकता है।
विद्यालय भवन निर्माण में ठेकेदारों की भूमिका पर सवाल
शिकायतकर्ता ने विद्यालयों में भवन निर्माण कार्यों को लेकर भी अनियमितता की आशंका जताई है। आरोप है कि निर्माण कार्यों में विद्यालय प्रबंध समिति अथवा संबंधित शिक्षकों की निर्धारित भूमिका के बजाय ठेकेदारों के माध्यम से काम कराए जाने को बढ़ावा दिया जा रहा है।
यदि निर्माण प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी हुई है, तो कार्यादेश, भुगतान संबंधी अभिलेख, निर्माण की गुणवत्ता और मौके पर हुए काम की तकनीकी जांच महत्वपूर्ण होगी। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि निर्माण कार्य किसकी अनुमति से कराया गया और भुगतान की प्रक्रिया क्या रही। केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता; निष्पक्ष जांच से ही वास्तविकता सामने आएगी।
शिक्षिका को धमकी देने और प्रतिदिन मांस मंगवाने का आरोप
शिकायत का सबसे संवेदनशील पहलू एक शिक्षिका से जुड़ा है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि संबंधित शिक्षिका को कथित तौर पर डराकर प्रतिदिन मांस मंगवाने के लिए कहा जाता था और ऐसा नहीं करने पर विद्यालय की जांच कराने की धमकी दी जाती थी। इस गंभीर आरोप की पुष्टि के लिए संबंधित शिक्षिका का बयान, उपलब्ध साक्ष्य और अन्य लोगों की गवाही महत्वपूर्ण होगी।
शिकायत में यह भी आरोप है कि बीआरसी कार्यालय से पुस्तकों की ढुलाई का काम शिक्षकों से जबरन कराया जाता है तथा ऐसा नहीं करने पर विद्यालय की जांच कराने की धमकी दी जाती है। इस मामले में पुस्तक परिवहन की जिम्मेदारी, विभागीय आदेश और संबंधित अभिलेखों की पड़ताल आवश्यक है।
मजिस्ट्रेटी जांच की मांग, अब विभाग की कार्रवाई पर निगाहें
शिकायतकर्ता ने पूरे मामले की निष्पक्ष और गहन मजिस्ट्रेटी जांच कराकर आरोप सही पाए जाने पर जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की मांग की है। अब सवाल यह है कि संबंधित विभाग इन आरोपों की जांच के लिए क्या कदम उठाता है और शिकायत में उठाए गए बिंदुओं पर क्या स्पष्टीकरण सामने आता है।
मामला केवल कथित वसूली तक सीमित नहीं है। यह विद्यालयों की पारदर्शिता, शिक्षकों की कार्य परिस्थितियों और सरकारी संसाधनों के उपयोग से भी जुड़ा है। यदि आरोपों में तथ्य मिलते हैं, तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए; वहीं, यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं, तो स्थिति भी स्पष्ट की जानी चाहिए। फिलहाल, निष्पक्ष जांच और संबंधित अधिकारी का पक्ष सामने आने के बाद ही पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर साफ हो सकेगी।
पक्ष जानने के लिए बीएसए की cug पर फोन मिलाया गया पर बात नहीं हो सकी।
नोट: शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों पर यह खबर प्रकाशित हैशिकायत कर्ता के जांच की मांग पर आधारित है। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि तथा संबंधित अधिकारी का पक्ष उपलब्ध होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
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