(विश्लेषणात्मक आलेख : संजय पराते)
🔹बिहार की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर है। सत्ता की बाज़ी पलटने वाले ‘पलटूराम’ नीतीश कुमार की अवसरवादी राजनीति अब अपने अंत की ओर बढ़ती दिख रही है। महागठबंधन की एकजुटता और तेजस्वी यादव के मुख्यमंत्री पद के ऐलान ने विपक्षी खेमे में नई जान फूंक दी है, वहीं भाजपा-जद(यू) गठबंधन में असमंजस और अविश्वास की स्थिति गहराती जा रही है। बिहार की जनता अब बदलाव के मूड में है — जो सुशासन के वादों के बजाय रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय के वास्तविक मुद्दों पर फैसला सुनाने को तैयार है।
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🔹 नीतीश की ‘पलटी राजनीति’ पर जनता का मोहभंग
कभी सुशासन बाबू कहलाने वाले नीतीश कुमार अब जनता की नज़रों में ‘पलटूराम’ बन चुके हैं। भाजपा और आरएसएस के साथ उनके गठबंधन ने उन्हें उस फंदे में फंसा दिया है, जिससे बाहर निकलना लगभग असंभव है। भाजपा ने चुनाव बाद मुख्यमंत्री तय करने की घोषणा कर दी है, यानी नीतीश अब केवल मुखौटा बनकर रह गए हैं। चुनाव के बाद यदि वे पलटी मारने की कोशिश भी करेंगे, तो उनकी ही पार्टी उन्हें किनारे लगा देगी।
महागठबंधन के ऐलान ने उनकी राजनीतिक जमीन और कमजोर कर दी है। जनता अब स्पष्ट रूप से तय कर चुकी है — बिहार ‘अवसरवाद की राजनीति’ से मुक्त होगा।
🔹 भाजपा की खोती साख और धांधली पर जनता की नजर
पिछले विधानसभा चुनावों में महागठबंधन और एनडीए के बीच महज 12-13 हजार वोटों का फर्क था, लेकिन प्रशासनिक गड़बड़ियों ने भाजपा को 15 सीटों का फायदा दिला दिया। अब मतदाता सूची में हुई धांधलियों की पोल खुलने के बाद भाजपा का भरोसा और साख दोनों कमजोर हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट और जनता की निगरानी के बाद इस बार चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली की संभावना कम है — जिसका सीधा नुकसान भाजपा-जद(यू) को होगा।
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भाजपा की गिरती लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि गंगा किनारे बसे 12 जिलों — बक्सर, भोजपुर, सारण, पटना, वैशाली, समस्तीपुर, बेगुसराय, मुंगेर, खगड़िया, कटिहार, भागलपुर और लखीसराय — में एनडीए की हालत बेहद खराब है।
🔹 महागठबंधन का आत्मविश्वास और वामपंथ की भूमिका
महागठबंधन का नया घोषणापत्र वामपंथी दृष्टिकोण से प्रभावित है। भूमि सुधार, रोजगार, शिक्षा और सामाजिक न्याय के मुद्दे उसके केंद्र में हैं। वाम दलों की इस बार एकजुट और मजबूत उपस्थिति महागठबंधन की जीत को निर्णायक बना सकती है।
पिछले चुनाव में कांग्रेस ने 70 सीटों पर लड़कर केवल 19 जीती थीं, जबकि वाम दलों की सफलता दर दुगुनी थी। इस बार कांग्रेस अगर अपने अहं को त्यागकर सहयोगी दलों को सम्मानजनक हिस्सेदारी देगी, तो परिणाम ऐतिहासिक हो सकते हैं।
🔹 वोटर अधिकार और जनहित मुद्दे केंद्र में लाने की जरूरत
हालांकि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद आधार से जुड़े मतदाता विवाद अस्थायी रूप से थमे हैं, लेकिन ‘वोटर अधिकार यात्रा’ का संदेश अभी भी प्रासंगिक है। भाजपा द्वारा कमजोर वर्गों के मताधिकार को सीमित करने की कोशिशों का विरोध अब महागठबंधन के एजेंडे में शामिल होना चाहिए।
बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और खेती जैसे असली मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर ही विपक्ष सत्ता पक्ष की ओछी बयानबाज़ी से बच सकता है।
🔹 बिहार की जमीनी सच्चाई: आंकड़े बोलते हैं
भाजपा के ‘विकास’ के दावे आंकड़ों के बोझ तले दब गए हैं। नीति आयोग (2021) की रिपोर्ट बताती है कि बिहार में 6.5 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी में जी रहे हैं। 6.58 करोड़ लोग कुपोषित हैं — जिनमें 43.9% बच्चे और 60% महिलाएं शामिल हैं। मानव विकास सूचकांक (HDI) में बिहार 29वें स्थान पर है।
महिलाओं की स्थिति भी दयनीय है — 41% की शादी 18 वर्ष से पहले हो जाती है। शिक्षा में ड्रॉपआउट दर 20% से अधिक है, जबकि कॉलेज में दाखिले का अनुपात मात्र 17% है। स्वास्थ्य बीमा का लाभ पाने वाले परिवार केवल 14.6% हैं।
ये आंकड़े भाजपा-जद(यू) सरकार की “सुशासन” की सच्चाई उजागर करते हैं।
🔹 महागठबंधन का घोषणा पत्र: जमीन से जुड़ा एजेंडा
महागठबंधन ने अपने घोषणा पत्र में भूमिहीनों को अतिरिक्त जमीन देने, शिक्षा में सुधार, रोजगार सृजन, स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और कृषि सुधार जैसे ठोस वादे किए हैं। यदि ये नीतियां लागू होती हैं, तो बिहार को ‘बीमारू राज्य’ की श्रेणी से निकालने की क्षमता इन्हीं में है।
भूमि सुधार न केवल सामाजिक न्याय को मजबूत करेगा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी सशक्त बनाएगा — जिससे उपभोग, बाजार और रोजगार, तीनों में नई ऊर्जा आएगी।
🔹 इंडिया ब्लॉक के लिए बिहार बना नई उम्मीद की धरती
लोकसभा चुनाव में भाजपा का स्पष्ट बहुमत न मिलना और अब बिहार में एनडीए की गिरती स्थिति, यह संकेत है कि देश की राजनीति एक नए मोड़ पर है। इंडिया ब्लॉक के लिए बिहार अब वह मंच बन सकता है, जो 2024 के बाद के भारत की राजनीतिक दिशा तय करेगा।
नीतीश कुमार का भविष्य मोदी तय कर चुके हैं — लेकिन इंडिया ब्लॉक का भविष्य बिहार की जनता तय करेगी।
🟢 अब फैसला बिहार के मतदाताओं के हाथ में है। जनता समझ चुकी है कि धर्म और जाति की राजनीति ने राज्य को पिछड़ेपन की खाई में धकेला है। आने वाले चुनाव सिर्फ़ सरकार नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कार बदलने का चुनाव होंगे। बिहार बदलाव के लिए तैयार है — और ‘पलटूराम की राजनीति’ का अंत अब तय है।
📞 लेखक — संजय पराते, उपाध्यक्ष, छत्तीसगढ़ किसान सभा (अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध)
📱 संपर्क: 94242-31650
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