भारतीय ज्ञान परंपरा में लोक और शास्त्र का अद्भुत समन्वय: प्रो. अनामिका राय

ज्ञान से भारतीयता परिभाषित होती है, भारतीयता से ज्ञान नहीं: प्रो. अनामिका राय

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग में राजकीय बौद्ध संग्रहालय गोरखपुर के सहयोग से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘पुरातत्व एवं साहित्य के आलोक में भारतीय ज्ञान परंपरा’ के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज की स्कॉलर एवं इलाहाबाद विश्वविद्यालय की विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अनामिका राय ने कहा कि रामचरितमानस हमारी सामाजिक परंपरा और इतिहास दोनों का प्रतिबिंब है। कालिदास और अभिनव गुप्त का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में सृजन निरंतरता का रूप है, जिसमें नवीनता परंपरा के भीतर से ही उद्भासित होती है।
यक्षिणी मूर्तियों के संदर्भ में भरहुत, सांची और अमरावती के कलाकारों की प्रेरणा पर प्रश्न उठाते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति को लंबे समय तक उपनिवेशवादी दृष्टि से देखा गया। भारतीय ज्ञान परंपरा में लोक और शास्त्र परस्पर घुले-मिले हैं; केवल संगीत में भेद स्पष्ट दिखता है, अन्यथा दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। शास्त्रों में मूर्ति निर्माण हेतु पत्थरों की विशेषताओं का उल्लेख है और मूर्ति के नेत्र को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है।
प्रो. राय ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा प्रतीकों की परंपरा है। ‘वूमेन स्टडी’ भले पश्चिम में नई अवधारणा हो, किंतु भारत में स्त्री विमर्श प्राचीन काल से विद्यमान रहा है। तमिलनाडु की लोककथा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मां काली द्वारा शिव को नृत्य की चुनौती देना स्त्री-शक्ति की अभिव्यक्ति है।

उन्होंने गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक सहित उन विद्वानों के विचारों पर चर्चा की, जो वेद-पुराण और महाकाव्यों को आंशिक इतिहास मानते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि परंपरा न केवल मिथक है और न मात्र इतिहास; वह सामाजिक परिवर्तन से प्रभावित भी होती है और समाज को प्रभावित भी करती है। गिरमिटिया मजदूरों द्वारा मॉरीशस जाते समय गंगाजल, तुलसी पत्र और रामचरितमानस साथ ले जाने का उदाहरण देते हुए उन्होंने महाकाव्यों की सामाजिक भूमिका रेखांकित की।
स्त्री लेखन पर उठते प्रश्नों के संदर्भ में उन्होंने जयदेव के गीत गोविंद और काज़ी नज़रुल इस्लाम के काव्य का उल्लेख करते हुए कहा कि संवेदना का संबंध केवल लिंग से नहीं, बल्कि सृजनात्मक चेतना से है।
मुख्य वक्ता लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर प्रशांत श्रीवास्तव ने मानव उद्भव से लेकर भारतीय सभ्यता के विकास तक का तथ्यात्मक विवरण प्रस्तुत किया और जापानी चिकित्सा पद्धति के सूत्र भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़े।
कुलपति प्रोफेसर पूनम टंडन ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने के लिए इतिहास, पुरातत्व और साहित्य महत्वपूर्ण आधार हैं तथा पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर साक्ष्यों का अध्ययन आवश्यक है। विशिष्ट अतिथि संग्रहालय के उपनिदेशक डॉ. यशवंत सिंह राठौड़ ने संयुक्त शोध की प्रतिबद्धता दोहराई।
द्वितीय तकनीकी सत्र की अध्यक्षता लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर उमेश सिंह ने की, जिसमें 23 शोधपत्र प्रस्तुत हुए। समापन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में विश्वनाथ प्रसाद तिवारी उपस्थित रहेंगे।
उद्घाटन सत्र में पांच पुस्तकों का विमोचन
डॉ. कन्हैया सिंह की ‘प्राचीन भारतीय मुद्राओं का आर्थिक एवं सांस्कृतिक विवेचन’, डॉ. दिवाकर प्रसाद तिवारी की ‘पेशवा बाजीराव’, डॉ. धर्मेंद्र मौर्य की ‘प्राचीन भारत में सूर्योपासना के विविध आयाम’, डॉ. कृष्ण कुमार पांडेय की ‘पूर्वांचल नामाख्यान’ तथा प्रोफेसर राजवंत राव, प्रोफेसर प्रज्ञा चतुर्वेदी, डॉ. मनीन्द्र यादव और डॉ. विनोद कुमार के संयुक्त संपादन में प्रकाशित ‘अयोध्या की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत’ का विमोचन हुआ।

rkpNavneet Mishra

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