पदक आए, रैंक चौथी रही… फिर भी क्यों उठ रहा है भारत की खेल व्यवस्था पर सवाल?

एशियन गेम्स 2026 में 85 पदक, भारत चौथे स्थान पर; जश्न के बीच खेल सिस्टम पर उठे बड़े सवाल

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परवीन यादव -गौरव कुशवाहा की रिपोर्ट

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। एशियन गेम्स 2026 में भारत ने 85 पदकों के साथ चौथा स्थान हासिल किया। भारतीय खिलाड़ियों ने 21 स्वर्ण, 27 रजत और 37 कांस्य पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया। प्रतियोगिता के अंतिम चरण में भारतीय खिलाड़ियों ने जिस तरह लगातार पदक अपने नाम किए, उससे देशभर में उत्साह और जश्न का माहौल बना।
लेकिन पदक तालिका सामने आने के बाद उपलब्धियों के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है—क्या भारत का खेल सिस्टम उस गति से आगे बढ़ रहा है, जिसकी उम्मीद देश की बढ़ती खेल महत्वाकांक्षाओं से की जा रही है?
यह सवाल खिलाड़ियों की मेहनत या उनकी उपलब्धियों पर नहीं है। मैदान पर देश के लिए संघर्ष करने वाले हर खिलाड़ी का सम्मान जरूरी है। असली सवाल उस व्यवस्था का है, जो खिलाड़ियों को तैयार करती है, उन्हें प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय अनुभव उपलब्ध कराती है तथा बड़े मंच तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाती है।
हांगझोउ एशियन गेम्स 2023 में भारत ने 107 पदक जीतकर नया रिकॉर्ड बनाया था। उस समय भारत के खाते में 28 स्वर्ण, 38 रजत और 41 कांस्य पदक आए थे। 2026 में कुल पदकों की संख्या घटकर 85 रह गई। स्वर्ण पदक भी 28 से घटकर 21 हो गए। इसके बावजूद भारत चौथे स्थान पर कायम रहा। हांगझोउ में भी भारत की रैंकिंग चौथी थी।
आंकड़ों पर नजर डालें तो तीन साल में भारत के कुल पदकों में 22 की कमी आई है। हालांकि 85 पदकों को किसी भी तरह से असफलता नहीं कहा जा सकता, लेकिन इस गिरावट को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा। खासकर तब, जब भारत लगातार अपने खेल ढांचे को मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी भूमिका निभाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
इस प्रदर्शन का सही मूल्यांकन करने के लिए यह देखना जरूरी है कि किन खेलों में भारत ने पिछली बार से बेहतर प्रदर्शन किया, किन खेलों में गिरावट आई और किन स्पर्धाओं से पदक की उम्मीद होने के बावजूद परिणाम नहीं मिला। यही विश्लेषण बताएगा कि कमी कहां है और सुधार की जरूरत किस स्तर पर है।
एशियन गेम्स 2026 में भारत के प्रदर्शन में एथलेटिक्स की सबसे बड़ी भूमिका रही। एथलेटिक्स से भारत को 24 पदक मिले। शूटिंग ने 15, तीरंदाजी ने 9, जबकि बॉक्सिंग और कुश्ती ने 6-6 पदक दिलाए।
इन आंकड़ों से भारत की ताकत के साथ उसकी चुनौतियां भी सामने आती हैं। एथलेटिक्स ने सबसे ज्यादा पदक दिलाए, लेकिन स्वर्ण पदकों की संख्या केवल एक रही। इसके विपरीत तीरंदाजी ने 9 पदकों में 5 स्वर्ण हासिल किए। शूटिंग ने 15 पदकों के साथ 3 स्वर्ण भारत की झोली में डाले।
इससे साफ होता है कि अलग-अलग खेलों में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता एक जैसी नहीं है। किसी मजबूत खेल से बड़ी संख्या में पदक आ जाना पर्याप्त नहीं है। मजबूत खेल व्यवस्था की पहचान इस बात से भी होती है कि अलग-अलग खेलों में कितने खिलाड़ी स्वर्ण पदक की दौड़ तक पहुंच रहे हैं और उनके पीछे अगली पीढ़ी के कितने खिलाड़ी तैयार हैं।
यहीं पर भारत की तैयारी और निवेश का सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है। पिछले तीन वर्षों में एशियन गेम्स की तैयारियों के लिए करीब 800.70 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का उल्लेख सामने आया है। यह राशि खिलाड़ियों की ट्रेनिंग, अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भागीदारी, उपकरण, कोचिंग, विशेषज्ञ सहायता और अन्य तैयारियों से जुड़ी रही है।
ऐसे में सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि इस राशि के बदले कितने पदक मिले। असली सवाल यह है कि इस निवेश से भारत की खेल क्षमता कितनी मजबूत हुई। कितने खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर का अनुभव मिला? कितने नए प्रतिभाशाली खिलाड़ी तैयार हुए? किन खेलों में पदक का आधार मजबूत हुआ? चोट प्रबंधन, फिटनेस, खेल विज्ञान और विशेषज्ञ सपोर्ट में कितना सुधार हुआ?
इन सवालों का जवाब आने वाले वर्षों की रणनीति तय करने के लिए बेहद जरूरी है।
भारत के सामने चुनौती केवल अपने पिछले पदकों का रिकॉर्ड तोड़ने की नहीं है। एशिया में खेल प्रतिस्पर्धा लगातार तेज हो रही है। दक्षिण कोरिया लगातार भारत से आगे बना हुआ है और भारत दो लगातार एशियन गेम्स में चौथे स्थान पर रहा है। इसका अर्थ यह है कि भारत ने अपनी स्थिति बरकरार जरूर रखी है, लेकिन शीर्ष तीन में प्रवेश की दिशा में अभी निर्णायक छलांग बाकी है।
भारत के पास प्रतिभाओं की कमी का तर्क भी अब पर्याप्त नहीं लगता। खेलो इंडिया, टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS), भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के केंद्रों और विभिन्न राज्य स्तरीय योजनाओं के माध्यम से खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है। इसके बावजूद सवाल यह है कि प्रतिभा की पहचान से लेकर उसे एशियन गेम्स और ओलंपिक स्तर का लगातार पदक विजेता बनाने तक की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है।
किसी एक खिलाड़ी की असाधारण सफलता को पूरे खेल सिस्टम की सफलता मान लेना भी सही नहीं होगा। मजबूत व्यवस्था तब मानी जाती है, जब एक खिलाड़ी के पीछे कई और सक्षम खिलाड़ी तैयार हों। किसी खिलाड़ी के चोटिल होने या उपलब्ध नहीं रहने पर उसकी जगह लेने वाला खिलाड़ी मौजूद हो। एक पीढ़ी के खत्म होने से पहले अगली पीढ़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर के लिए तैयार हो चुकी हो।
यही वह क्षेत्र है जहां भारत को अपनी रणनीति पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है।
सरकारी योजनाओं और खेल केंद्रों की संख्या बढ़ना निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है, लेकिन उनकी वास्तविक सफलता का आकलन अंतरराष्ट्रीय परिणामों से होना चाहिए। प्रत्येक बड़े टूर्नामेंट के बाद खेल व्यवस्था का विस्तृत प्रदर्शन ऑडिट किया जाना चाहिए। इसमें यह देखा जाए कि किस खेल में कितना निवेश हुआ, खिलाड़ियों को किस तरह की सहायता मिली, अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर कितना मिला और उसका वास्तविक परिणाम क्या रहा।
जहां प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा, वहां केवल खिलाड़ी को जिम्मेदार ठहराने के बजाय पूरी तैयारी प्रक्रिया की समीक्षा होनी चाहिए। कोचिंग, खेल विज्ञान, फिटनेस, चोट प्रबंधन, मानसिक तैयारी, प्रतियोगिता अनुभव और सपोर्ट स्टाफ—हर स्तर पर कमियों की पहचान जरूरी है।
क्योंकि मैदान पर हार या पदक न मिलने का कारण हमेशा खिलाड़ी की क्षमता नहीं होता। कई बार तैयारी की कमी भी परिणाम को प्रभावित करती है। अगर खिलाड़ी को पर्याप्त संसाधन और विशेषज्ञ सहयोग मिला था, फिर भी प्रदर्शन उम्मीद से कम रहा, तो वहां रणनीति और तैयारी की समीक्षा की जानी चाहिए। यही जवाबदेही भारत के खेल सिस्टम को अगले स्तर तक ले जा सकती है।
एशियन गेम्स 2026 का 85 पदकों वाला प्रदर्शन इसलिए दो तस्वीरें एक साथ दिखाता है। एक तरफ 21 स्वर्ण समेत 85 पदक हैं, जो भारतीय खिलाड़ियों की मेहनत, प्रतिभा और संघर्ष का प्रमाण हैं। दूसरी तरफ 2023 के 107 पदकों की तुलना में 22 पदकों की कमी है, जो खेल व्यवस्था के सामने आत्ममंथन का अवसर रखती है।
भारत का खेल सिस्टम पिछले वर्षों में निश्चित रूप से मजबूत हुआ है। कई खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने विश्वस्तरीय प्रदर्शन किया है और 21 स्वर्ण पदक इसकी बड़ी मिसाल हैं। लेकिन लगातार दो एशियन गेम्स में चौथे स्थान पर रहना यह भी बताता है कि शीर्ष तीन में पहुंचने के लिए मौजूदा प्रयासों से आगे जाना होगा।
अब लक्ष्य सिर्फ 85 से 86 पदक तक पहुंचने का नहीं होना चाहिए। लक्ष्य ऐसा खेल ढांचा तैयार करने का होना चाहिए, जहां हर प्रमुख खेल में मजबूत दूसरी और तीसरी कतार मौजूद हो। खिलाड़ियों को कम उम्र से वैज्ञानिक प्रशिक्षण मिले, अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों का पर्याप्त अनुभव मिले और एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी तैयार रखने की व्यवस्था लगातार चलती रहे।
85 पदकों का जश्न जरूर मनाया जाना चाहिए। 21 स्वर्ण जीतने वाले खिलाड़ियों को पूरे देश की ओर से सम्मान मिलना चाहिए। लेकिन इसी जश्न के बीच खेल व्यवस्था से एक सवाल पूछना भी जरूरी है—हांगझोउ के 107 से 2026 के 85 पदकों तक पहुंचने के बाद हमने क्या सीखा और अगली बड़ी प्रतियोगिता में इससे आगे निकलने के लिए अभी से क्या बदला जा रहा है?
यही सवाल भारत के अगले खेल सफर की दिशा तय करेगा।

Editor CP pandey

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