सुप्रीम कोर्ट के पास राहुल गांधी पर महिला पत्रकार से बदसलूकी का आरोप, गर्भवती पत्रकार के सीढ़ियों पर गिरने का दावा; टूटा फोन, मचा हड़कंप
नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। राजधानी दिल्ली में 13 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के पास विरोध मार्च के दौरान महिला पत्रकार ऋचा पाराशर ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और उनके सुरक्षाकर्मियों पर बदसलूकी करने तथा धक्का देने का गंभीर आरोप लगाया है। पत्रकार का दावा है कि इस घटना में उन्हें चोटें आईं और वह सीढ़ियों पर गिर गईं। उन्होंने बताया कि वह गर्भावस्था की पहली तिमाही में हैं, ऐसे में घटना के बाद उन्हें अपनी सेहत और गर्भस्थ शिशु की सुरक्षा को लेकर चिंता हुई। उनके आरोपों ने राजनीतिक कार्यक्रमों में पत्रकारों की सुरक्षा और महिला पत्रकारों के सम्मान को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ऋचा पाराशर के मुताबिक, वह एक सामान्य रिपोर्टिंग असाइनमेंट के तहत विरोध मार्च को कवर करने पहुंची थीं। उन्होंने अपना माइक्रोफोन लगाया ही था कि अचानक स्थिति बिगड़ गई। पत्रकार का आरोप है कि राहुल गांधी आगे बढ़े और उन्होंने उनका हाथ पकड़कर खींचा। इसी दौरान उनके सुरक्षाकर्मियों ने कथित तौर पर उन्हें धक्का दे दिया, जिससे वह संतुलन खो बैठीं और सीढ़ियों पर गिर गईं।
पत्रकार का दावा—कैमरे में रिकॉर्ड हुई पूरी घटना ऋचा पाराशर ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि घटनाक्रम इतना तेजी से हुआ कि उन्हें संभलने का मौका तक नहीं मिला। उनके अनुसार, उन्होंने मौके पर मौजूद लोगों से बार-बार धक्का नहीं देने की गुहार लगाई, लेकिन भीड़ के बीच उनकी बात नहीं सुनी गई। उन्होंने दावा किया कि धक्का लगने से उनका फोन भी टूट गया, जबकि कॉलर पर लगा माइक्रोफोन घटना के दौरान रिकॉर्डिंग करता रहा।
पत्रकार का कहना है कि उनके पास मौजूद वीडियो में कथित घटनाक्रम दिखाई देता है। हालांकि, घटना की पूरी परिस्थितियों और वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि के बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। राहुल गांधी या उनके सुरक्षाकर्मियों का इस विशेष आरोप पर आधिकारिक पक्ष सामने आने पर मामले की तस्वीर और स्पष्ट हो सकेगी।
भीड़ के नारों में दब गई मदद की गुहार पाराशर ने आरोप लगाया कि घटना के समय वह लगातार मदद मांग रही थीं। उनके मुताबिक, वह लोगों को बता रही थीं कि उन्हें धक्का दिया गया है, लेकिन वहां मौजूद कुछ लोगों के राहुल गांधी के समर्थन में नारे लगाने के कारण उनकी आवाज दब गई। उन्होंने कहा कि गिरने के बाद वह उठीं और लोगों को घटना के बारे में बताने लगीं।
पत्रकार ने यह भी दावा किया कि आसपास मौजूद लोगों में से किसी ने तत्काल उनकी स्थिति जानने या उन्हें पानी देने जैसी बुनियादी मदद की पेशकश नहीं की। उन्होंने कहा कि भीड़ के बीच उन्हें सांस लेने में परेशानी हुई और वह मानसिक रूप से बेहद परेशान हो गईं। उनके अनुसार, बाद में वह बैठकर रोने लगीं।
गर्भावस्था के शुरुआती दौर में गिरने से बढ़ी चिंता ऋचा पाराशर ने बताया कि गर्भावस्था की पहली तिमाही में होने के कारण घटना ने उन्हें और अधिक डरा दिया। उनका कहना है कि वह पेट के बल गिरी थीं, इसलिए उन्हें अपनी और गर्भस्थ शिशु की स्थिति को लेकर चिंता सताने लगी। ऐसी परिस्थिति में चोट लगने या गिरने के बाद चिकित्सकीय जांच कराना महत्वपूर्ण होता है। हालांकि, पत्रकार की वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति और चिकित्सकीय जांच के निष्कर्षों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
पत्रकारों की सुरक्षा पर फिर उठे सवाल इस घटना से राजनीतिक कार्यक्रमों और विरोध प्रदर्शनों के दौरान पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल सामने आए हैं। रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारों को भीड़, धक्का-मुक्की और अव्यवस्थित सुरक्षा प्रबंधन जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में आयोजकों और सुरक्षा कर्मियों की जिम्मेदारी है कि मीडिया कर्मियों को सुरक्षित तरीके से अपना काम करने का अवसर मिले।
यदि किसी पत्रकार के साथ दुर्व्यवहार या हिंसा होती है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और उपलब्ध वीडियो तथा अन्य साक्ष्यों के आधार पर तथ्यों को स्पष्ट किया जाना चाहिए। साथ ही, किसी भी व्यक्ति पर लगाए गए आरोपों को जांच से पहले अंतिम सत्य मानने से बचना भी जरूरी है।
ऋचा पाराशर के आरोपों की निष्पक्ष जांच, संबंधित पक्षों का जवाब और घटना के वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि इस मामले में महत्वपूर्ण होगी। राजनीतिक मतभेद चाहे जितने हों, पत्रकारों की सुरक्षा, महिलाओं का सम्मान और सार्वजनिक स्थलों पर मानवीय संवेदनशीलता लोकतांत्रिक व्यवस्था के बुनियादी मूल्य हैं।
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