शारदीय नवरात्र: थावे से देवरिया तक मां के दरबार में भक्तों का तांता, जयकारों से गूंजे शक्तिपीठ; जानिए कहां उमड़ रही आस्था की भीड़
गोपालगंज/सीवान/देवरिया/गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा की आराधना के साथ पूरा पूर्वांचल और बिहार का सीमावर्ती इलाका भक्तिमय हो उठा है। कहीं मां सिंहासनी के दिव्य दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग रही हैं, तो कहीं मां चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना कर भक्त परिवार की सुख-समृद्धि और शांति की कामना कर रहे हैं। बिहार के प्रसिद्ध थावे दुर्गा मंदिर से लेकर सीवान के मैरवा स्थित मां चंदनिया डीह मंदिर और उत्तर प्रदेश के देवरिया, गोरखपुर तथा कुशीनगर के प्रमुख देवी मंदिरों तक आस्था का उत्साह देखने को मिल रहा है। नवरात्र के तीसरे दिन मंगलवार को गोपालगंज स्थित थावे दुर्गा मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रही। मंगला आरती के बाद सुबह से ही मां सिंहासनी के दर्शन के लिए भक्त कतारबद्ध हो गए। बिहार, उत्तर प्रदेश और नेपाल सहित विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे श्रद्धालुओं ने माता के दरबार में मत्था टेककर परिवार की खुशहाली की प्रार्थना की। मंदिर परिसर में गूंजते जयकारों और फूलों-चुनरी से की गई सजावट ने धार्मिक वातावरण को और आकर्षक बना दिया। थावे मंदिर में मां के दर्शन के बाद कई श्रद्धालुओं ने भक्त रहषु मंदिर में भी पूजा-अर्चना की। मंदिर प्रशासन और स्थानीय व्यवस्था से जुड़े लोग भीड़ को नियंत्रित करने में जुटे रहे। सुरक्षा के मद्देनजर पुलिसकर्मी मुस्तैद दिखाई दिए। मुख्य पुजारी पंडित संजय पांडेय ने श्रद्धालुओं को रक्षा सूत्र बांधा। धार्मिक मान्यता है कि मां सिंहासनी के दर्शन और सच्चे मन से की गई आराधना से भक्तों को मानसिक शांति तथा सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। थावे मंदिर: दूर-दराज से पहुंचते हैं श्रद्धालु गोपालगंज शहर से लगभग छह किलोमीटर दक्षिण, गोपालगंज-सीवान राष्ट्रीय राजमार्ग के निकट स्थित थावे दुर्गा मंदिर क्षेत्र का प्रमुख आस्था केंद्र है। नवरात्र के दौरान यहां बिहार के विभिन्न जिलों के साथ उत्तर प्रदेश, झारखंड, दिल्ली और नेपाल से भी श्रद्धालुओं के पहुंचने की परंपरा रही है। मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और दर्शन के लिए बड़ी संख्या में भक्त आते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्चे मन से मां की आराधना करने से मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। हथुआ में मां चंद्रघंटा की आराधना गोपालगंज के हथुआ नगर और आसपास के ग्रामीण इलाकों में भी नवरात्र के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा की गई। हथुआ गांव के दक्षिण मोहल्ले में स्थित प्राचीन दुर्गा मंदिर सहित विभिन्न मंदिरों में सुबह से श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रही। भक्तों ने पुष्प और पूजन सामग्री अर्पित कर विधि-विधान से पूजा की तथा परिवार के कल्याण की कामना की। धार्मिक मान्यता के अनुसार मां चंद्रघंटा शांति, साहस और कल्याण की प्रतीक हैं। उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित रहता है, इसी कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। नवरात्र के तीसरे दिन उनके पूजन का विशेष महत्व माना जाता है। मां चंद्रघंटा का मंत्र “पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥” मैरवा का मां चंदनिया डीह मंदिर: पूजा के साथ विवाह की परंपरा सीवान जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर मैरवा में स्थित मां चंदनिया डीह दुर्गा मंदिर स्थानीय लोगों की गहरी आस्था का केंद्र है। मैरवा रेलवे स्टेशन के उत्तर दिशा में स्थित इस मंदिर में नवरात्र सहित विभिन्न धार्मिक अवसरों पर श्रद्धालु पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं। इस मंदिर की एक खास पहचान यहां मां दुर्गा को साक्षी मानकर विवाह की रस्में पूरी करने की परंपरा भी है। स्थानीय स्तर पर मंदिर में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विवाह संपन्न होने की घटनाएं सामने आती रही हैं। जून 2022 में यहां एक प्रेमी जोड़े के विवाह की खबर प्रकाशित हुई थी। नवंबर 2024 में मंदिर परिसर में आयोजित शतचंडी महायज्ञ के समापन अवसर पर भी श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने की रिपोर्ट सामने आई थी। इससे स्पष्ट होता है कि मंदिर की पहचान धार्मिक आयोजनों के साथ सामाजिक परंपराओं से भी जुड़ी हुई है। विवाह भवन से मिल सकती है सहूलियत मंदिर के निकट जिला परिषद की ओर से विवाह भवन का निर्माण कराया गया था। वर्ष 2020 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, इस भवन के निर्माण पर करीब 42.5 लाख रुपये खर्च किए गए थे। इसका उद्देश्य स्थानीय परिवारों को शादी-विवाह जैसे मांगलिक आयोजनों के लिए सुविधा उपलब्ध कराना था। भवन की मौजूदा स्थिति और उपलब्ध सुविधाओं की पुष्टि अलग से किए जाने की आवश्यकता है। स्थानीय स्तर पर मंदिर को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की मांग भी उठती रही है। साफ-सफाई, बैठने की व्यवस्था, पेयजल, पहुंच मार्ग और अन्य बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाया जाए तो श्रद्धालुओं को सहूलियत मिलने के साथ क्षेत्र की धार्मिक पहचान को भी बढ़ावा मिल सकता है। देवरिया से कुशीनगर तक देवी मंदिरों में आस्था बिहार के थावे और सीवान के मंदिरों की तरह उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में भी अनेक देवी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े हैं। देवरिया जनपद में अहिल्यापुर मंदिर, बरहज क्षेत्र के मोहाव की महरानी और शहर का देवरही मंदिर प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिने जाते हैं। रुद्रपुर क्षेत्र के आसपास परमसुंदरी माता और कोट की माई के मंदिरों में भी श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। वहीं गोरखपुर क्षेत्र में तरकुलही माता और बुढ़िया माता के मंदिर श्रद्धालुओं के बीच विशेष धार्मिक पहचान रखते हैं। कुशीनगर क्षेत्र में खनुआ की देवी का मंदिर भी स्थानीय आस्था से जुड़ा हुआ है। नवरात्र के दौरान इन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है और भक्त माता के दर्शन कर परिवार की सुख-शांति की कामना करते हैं। आस्था के साथ व्यवस्था और स्वच्छता भी जरूरी नवरात्र केवल पूजा-पाठ का पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सेवा और सद्भाव का संदेश भी देता है। मंदिरों में उमड़ने वाली भीड़ को देखते हुए सुरक्षा, स्वच्छता, पेयजल, प्राथमिक चिकित्सा, महिलाओं और बुजुर्गों के लिए सुविधाएं तथा यातायात प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। श्रद्धालुओं को भी कतार का पालन करने, परिसर को साफ रखने और प्रशासन का सहयोग करने की आवश्यकता है। थावे से मैरवा और देवरिया से गोरखपुर-कुशीनगर तक देवी मंदिरों में उमड़ती आस्था इस क्षेत्र की समृद्ध धार्मिक परंपरा की झलक पेश करती है। मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना के बीच श्रद्धालु जहां सुख-समृद्धि और शांति की प्रार्थना कर रहे हैं, वहीं इन धार्मिक स्थलों की बेहतर व्यवस्था और विकास की उम्मीद भी कर रहे हैं।
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