अवैध संबंध से खत्म नहीं होगा विधवा का कानूनी दर्जा, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पलटा निचली अदालत का फैसला

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बच्चों की वैधता पर भी हाईकोर्ट सख्त, सिर्फ दूसरे पुरुष से संबंध साबित करना पर्याप्त नहीं

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प्रयागराज (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विधवा के कानूनी दर्जे और बच्चों की वैधता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी महिला के बाद में बने अवैध संबंध उसके विधवा होने की कानूनी स्थिति को समाप्त नहीं कर सकते। अदालत ने बलिया की महिला से जुड़े मामले में निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए वादी का मुकदमा खारिज कर दिया।
न्यायमूर्ति अनिल कुमार ने प्रथम अपील स्वीकार करते हुए कहा कि यदि महिला का विवाह संबंधित व्यक्ति से हुआ था और उसके पति की मृत्यु हो गई, तो पति की मृत्यु के साथ उसे विधवा का कानूनी दर्जा प्राप्त हो जाता है। बाद में किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध होने का आरोप इस दर्जे को समाप्त करने का आधार नहीं बन सकता।
मामला वर्ष 1988 में दायर एक दीवानी वाद से जुड़ा था। वादी ने अदालत से घोषणा की मांग की थी कि अपीलार्थी दिवंगत व्यक्ति की विधवा नहीं हैं और उनके बेटों को दिवंगत व्यक्ति का वैध पुत्र तथा उत्तराधिकारी नहीं माना जा सकता। वादी के अनुसार संबंधित व्यक्ति की वर्ष 1938 में मृत्यु हुई थी और वह निःसंतान थे। आरोप लगाया गया कि इसके बाद अपीलार्थी के उनके साथ संबंध बने और उनसे दो बेटे पैदा हुए।
वादी की ओर से यह तर्क भी दिया गया था कि महिला ब्राह्मण विधवा थीं और उस समय उनके लिए पुनर्विवाह की अनुमति नहीं थी। बलिया के अपर जिला जज द्वितीय ने पहले वादी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए मुकदमे की डिक्री कर दी थी।
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि स्वयं वादी ने यह तथ्य स्वीकार किया है कि अपीलार्थी का विवाह दिवंगत व्यक्ति से हुआ था और उनकी मृत्यु 1938 में हुई थी। ऐसी स्थिति में पति की मृत्यु के बाद विधवा का दर्जा कानून के प्रभाव से प्राप्त होता है। बाद के कथित अवैध संबंध इस कानूनी स्थिति को समाप्त नहीं कर सकते।
अदालत ने बच्चों की वैधता के सवाल पर भी अहम टिप्पणी की। साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के संदर्भ में हाईकोर्ट ने कहा कि वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे की वैधता के पक्ष में कानूनी उपधारणा होती है। केवल यह आरोप या प्रमाण कि मां के किसी अन्य व्यक्ति से संबंध थे, इस उपधारणा को खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए यह साबित करना आवश्यक है कि संबंधित अवधि में पति की पत्नी तक पहुंच ही नहीं थी।
हाईकोर्ट ने पाया कि वर्ष 1960 के कथित संबंधों के संबंध में वादी या उसके गवाहों के पास कोई ठोस और स्वतंत्र साक्ष्य नहीं था। अदालत ने ऐसे आरोपों को पर्याप्त प्रमाण के अभाव में निराधार माना।
अदालत ने वर्ष 1963 की उस कार्यवाही को भी निर्णायक प्रमाण मानने से इनकार किया, जिसमें सीआरपीसी की धारा 488 के तहत महिला को 15 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण दिए जाने का उल्लेख था और उसे कथित अवैध संबंधों से जोड़ा गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि जिस पूर्व कार्यवाही का सहारा लिया गया, उसमें अपीलार्थी पक्षकार नहीं थीं। इसलिए साक्ष्य अधिनियम की धारा 33 की आवश्यक शर्तें पूरी नहीं होतीं। साथ ही धारा 41 के तहत उस पुराने फैसले को ऐसा निर्णय भी नहीं माना जा सकता, जो वर्तमान दीवानी विवाद में स्वतः निर्णायक हो।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 488 के तहत होने वाली कार्यवाही त्वरित और संक्षिप्त प्रकृति की होती है। उसमें संपत्ति के स्वामित्व या उत्तराधिकार जैसे जटिल दीवानी अधिकारों का अंतिम निर्धारण नहीं किया जाता। आपराधिक अदालत में दर्ज कोई निष्कर्ष भी दीवानी मुकदमे में अपने आप बाध्यकारी नहीं हो जाता। अधिकतम उसे मामले के रिकॉर्ड में मौजूद एक परिस्थिति के रूप में देखा जा सकता है।
हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि वादी ने संपत्ति में कथित गलत नामांतरण को चुनौती नहीं दी और न ही उससे जुड़ी कोई परिणामी राहत मांगी। जब किसी पक्ष के पास केवल घोषणा से आगे की राहत मांगने का अवसर मौजूद हो और वह ऐसी राहत की मांग न करे, तो केवल घोषणा के आधार पर राहत देना कानूनन उचित नहीं माना जा सकता।
इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बलिया के अपर जिला जज द्वितीय द्वारा पारित निर्णय और डिक्री को रद्द कर दिया तथा मूल वाद को खारिज कर दिया। इस फैसले में अदालत ने विधवा के कानूनी दर्जे, वैवाहिक संबंधों से जुड़े आरोपों और विवाह के दौरान जन्मे बच्चों की वैधता को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है।

Editor CP pandey

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