15 जनवरी: इतिहास के वे महान व्यक्तित्व जिनके निधन ने देश को गहरी छाया में ढक दिया
भारतीय इतिहास में 15 जनवरी केवल एक तारीख नहीं, बल्कि वह दिन है जब राजनीति, साहित्य, सिनेमा, पत्रकारिता और राष्ट्रसेवा से जुड़े अनेक महान व्यक्तित्वों का अवसान हुआ। इन विभूतियों ने अपने जीवनकाल में जो योगदान दिया, वह आज भी भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक चेतना को दिशा देता है। आइए जानते हैं 15 जनवरी को हुए महत्वपूर्ण निधन और उनके जीवन, जन्मस्थल व राष्ट्रहित में योगदान के बारे में विस्तार से।
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रामेश्वर ठाकुर (निधन: 15 जनवरी 2015)
रामेश्वर ठाकुर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और अनुभवी राजनेता थे। उनका जन्म बिहार के मुंगेर ज़िले में हुआ था। उन्होंने स्वतंत्रता के बाद भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। वे कई बार राज्यसभा सदस्य रहे और केरल तथा मध्य प्रदेश के राज्यपाल भी बने। सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा उनके राजनीतिक जीवन का मूल मंत्र रहा। उन्होंने हमेशा संघीय ढांचे और राज्यों के अधिकारों की वकालत की। सरल व्यक्तित्व और सैद्धांतिक राजनीति के लिए उन्हें सम्मानपूर्वक याद किया जाता है।
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नामदेव ढसाल (निधन: 15 जनवरी 2014)
नामदेव ढसाल का जन्म महाराष्ट्र के पुणे ज़िले में हुआ था। वे मराठी साहित्य के क्रांतिकारी कवि, लेखक और प्रखर मानवाधिकार कार्यकर्ता थे। वे दलित पैंथर आंदोलन के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे। उनकी कविताओं में सामाजिक अन्याय, जातिगत उत्पीड़न और शहरी यथार्थ का तीखा चित्रण मिलता है। उन्होंने साहित्य को केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि प्रतिरोध का हथियार बनाया। मराठी साहित्य को नई भाषा, नया तेवर और नई चेतना देने में उनका योगदान अमिट है।
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होमाई व्यारावाला (निधन: 15 जनवरी 2012)
होमाई व्यारावाला भारत की पहली महिला फ़ोटो पत्रकार थीं। उनका जन्म गुजरात के नवसारी ज़िले में हुआ था। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों तक ऐतिहासिक क्षणों को अपने कैमरे में कैद किया। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, संविधान सभा और अंतरराष्ट्रीय नेताओं की दुर्लभ तस्वीरें उनकी विरासत हैं। पुरुष-प्रधान पत्रकारिता जगत में उन्होंने महिलाओं के लिए नई राह खोली और भारतीय फोटो जर्नलिज़्म को वैश्विक पहचान दिलाई।
तपन सिन्हा (निधन: 15 जनवरी 2009)
तपन सिन्हा का जन्म बंगाल के हावड़ा ज़िले में हुआ था। वे भारतीय सिनेमा के संवेदनशील और सामाजिक सरोकारों से जुड़े महान फिल्म निर्देशक थे। उनकी फिल्मों में आम आदमी का संघर्ष, नैतिक मूल्य और सामाजिक विसंगतियां प्रमुख विषय रहे। ‘कबुलीवाला’, ‘एक डॉक्टर की मौत’ और ‘सफेद हाथी’ जैसी फिल्मों ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई। उन्होंने व्यावसायिकता से हटकर सिनेमा को समाज सुधार का माध्यम बनाया।
मोहम्मद सलीम (निधन: 15 जनवरी 2004)
मोहम्मद सलीम वामपंथी राजनीति के सशक्त चेहरा थे। उनका जन्म पश्चिम बंगाल के कोलकाता में हुआ। वे 16वीं लोकसभा के सांसद रहे और श्रमिकों, अल्पसंख्यकों तथा वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष किया। संसद में उनकी स्पष्टवादिता और जनपक्षधर सोच उन्हें विशिष्ट बनाती थी। उन्होंने लोकतंत्र में वैचारिक विविधता और सामाजिक समानता को मजबूती प्रदान की।
गुलज़ारीलाल नन्दा (निधन: 15 जनवरी 1998)
गुलज़ारीलाल नन्दा का जन्म पंजाब (अब पाकिस्तान के सियालकोट) में हुआ था। वे भारत के कार्यकारी प्रधानमंत्री रहे और देश को संक्रमणकाल में स्थिर नेतृत्व प्रदान किया। श्रम मंत्री के रूप में उन्होंने श्रमिक कानूनों को सशक्त किया। सादगी, ईमानदारी और निष्ठा उनके व्यक्तित्व की पहचान थी। उन्होंने सत्ता को सेवा का माध्यम माना और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की।
आर. आर. दिवाकर (निधन: 15 जनवरी 1990)
आर. आर. दिवाकर का जन्म कर्नाटक राज्य में हुआ था। वे स्वतंत्रता सेनानी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे। वे आंध्र प्रदेश और बिहार के राज्यपाल भी रहे। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ-साथ उन्होंने प्रशासनिक दक्षता और संवैधानिक मर्यादाओं का पालन किया। उनका जीवन राष्ट्रसेवा और लोकतांत्रिक आदर्शों को समर्पित रहा।
सदाशिवराव भाऊ (निधन: 15 जनवरी 1761)
सदाशिवराव भाऊ का जन्म महाराष्ट्र में हुआ था। वे मराठा साम्राज्य के वीर सेनानायक और पेशवा बाजीराव प्रथम के भतीजे थे। पानीपत की तीसरी लड़ाई में उन्होंने मराठा सेना का नेतृत्व किया और वीरगति को प्राप्त हुए। उनका बलिदान भारतीय इतिहास में साहस, रणनीति और राष्ट्ररक्षा के प्रतीक के रूप में स्मरण किया जाता है।
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