महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। शाम तो सबकी होती है। सूरज ढलता है तो अंधेरा किसी एक दरवाज़े पर नहीं रुकता। लेकिन सवेरा—वह सबका नहीं होता। यही हमारे समय का सबसे बड़ा सामाजिक और नैतिक प्रश्न है।
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में अवसरों की समानता का वादा किया गया था। संविधान ने अधिकार दिए, सरकारों ने योजनाएं बनाईं, और विकास के सपनों को जन-जन तक पहुंचाने का दावा किया गया। परंतु जमीनी सच्चाई यह है कि विकास की रोशनी हर घर तक समान रूप से नहीं पहुंच पाई है। अंधेरा साझा है, लेकिन उजाला नहीं।
महानगरों की चमक-दमक, डिजिटल क्रांति, स्टार्टअप संस्कृति और आधुनिक स्वास्थ्य-शिक्षा सुविधाएं विकास की तस्वीर का एक पहलू हैं। वहीं दूसरी ओर ग्रामीण अंचलों की वास्तविकता अब भी संघर्षपूर्ण है।
कई गांवों में आज भी स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक नहीं, अस्पतालों में आवश्यक दवाएं नहीं और युवाओं के पास स्थायी रोजगार के अवसर सीमित हैं। समान अवसर का नारा तो सबके लिए है, लेकिन अवसर तक पहुंच की सीढ़ी कुछ ही लोगों के लिए सरल है।
यह विरोधाभास हमारे विकास मॉडल पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। क्या विकास का अर्थ केवल आर्थिक वृद्धि है, या वह सामाजिक न्याय और समान अवसर से भी जुड़ा होना चाहिए?
सवेरा केवल सूरज के निकलने का नाम नहीं। सवेरा तब होता है जब—
किसान को उसकी फसल का न्यायपूर्ण मूल्य मिले।
मजदूर को श्रम का सम्मानजनक पारिश्रमिक मिले।
युवा को उसकी प्रतिभा के अनुरूप रोजगार मिले।
बेटी निर्भय होकर अपने सपनों को साकार कर सके।
यदि इन मूल आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती, तो विकास का उजाला अधूरा ही रहेगा।
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आज आर्थिक असमानता की खाई पहले से कहीं अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। एक ओर सीमित हाथों में संपत्ति का केंद्रीकरण बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर बहुसंख्यक वर्ग संघर्षपूर्ण जीवन जी रहा है।
जब तक अवसरों का वितरण न्यायपूर्ण नहीं होगा, तब तक समावेशी विकास केवल एक नारा बनकर रह जाएगा। विकास का पहिया तभी संतुलित घूमेगा, जब उसकी गति समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलेगी।
समाधान केवल सरकारों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। नीति-निर्माताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि योजनाएं कागजों से निकलकर धरातल तक प्रभावी ढंग से पहुंचें।
शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार—ये तीन स्तंभ किसी भी समाज के वास्तविक सवेरे की आधारशिला हैं। इनके बिना विकास का दावा खोखला रहेगा।
साथ ही समाज को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। जागरूक नागरिकता, पारदर्शिता की मांग और सामाजिक संवेदनशीलता ही स्थायी परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।
अंततः यह याद रखना होगा कि शाम नियति हो सकती है, लेकिन सवेरा संघर्ष और संकल्प से आता है। यदि हम समानता, न्याय और अवसर की भावना को व्यवहार में उतारें, तो वह दिन दूर नहीं जब हर घर में समान उजाला होगा।
अन्यथा इतिहास गवाही देगा—अंधेरा तो सबका था, लेकिन सवेरा कुछ का ही रहा।
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