डॉ सतीश पाण्डेय
महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)। जल केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। मानव शरीर से लेकर खेती, पशुपालन और पर्यावरण तक—हर क्षेत्र में पानी की अनिवार्यता निर्विवाद है। बावजूद इसके, जल का अंधाधुंध दोहन और संरक्षण के प्रति लापरवाही आने वाले समय में गंभीर संकट का संकेत दे रही है। सच यही है कि जल ही जीवन है और हर बूंद में हमारी सांसें बसी हैं।
जिले के कई क्षेत्रों में भू-जल स्तर लगातार गिर रहा है। तालाब, पोखरे और नहरें अतिक्रमण व गंदगी की चपेट में हैं। ग्रामीण इलाकों में गर्मी के दिनों में पेयजल संकट आम समस्या बन जाती है, जिससे आमजन को दूर-दराज से पानी लाने को मजबूर होना पड़ता है। यह स्थिति भविष्य के लिए चिंताजनक है।कृषि प्रधान जिले महाराजगंज में जल की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। फसलों की सिंचाई, पशुओं के पालन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ पानी पर ही टिकी है। यदि जल स्रोत सूखते गए, तो इसका सीधा असर किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा पर पड़ेगा।
सरकार द्वारा जल संरक्षण को लेकर विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं—तालाबों का पुनर्जीवन, वर्षा जल संचयन, नल-जल योजना जैसी पहलें इसी दिशा में कदम हैं। लेकिन इन योजनाओं की सफलता तभी संभव है, जब समाज भी अपनी जिम्मेदारी समझे और पानी की बर्बादी रोकने में सक्रिय भूमिका निभाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्षा जल का संग्रह, जल स्रोतों की साफ- सफाई, वृक्षारोपण और सीमित उपयोग जैसे छोटे-छोटे प्रयास मिलकर बड़े संकट को टाल सकते हैं। जल संरक्षण कोई एक दिन का अभियान नहीं, बल्कि निरंतर जन- आंदोलन होना चाहिए।
जल है तो कल है। यदि आज हमने हर बूंद की कीमत नहीं समझी, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। इसलिए समय की मांग है कि हम सब मिलकर जल को बचाएं, क्योंकि सच में—बूंद-बूंद में ही हमारी सांसें बसी हैं।
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