गांव का नाम बना अभिशाप: बलिया के रूपवार तवायफ में टूटी शादियां, बदली पहचान की मांग

घनश्याम तिवारी के कलम से

बलिया (राष्ट्र की परम्परा)उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में स्थित एक गांव रूपवार तवायफ इन दिनों अपने नाम को लेकर गहरी सामाजिक पीड़ा झेल रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि गांव का यह नाम अब उनकी पहचान नहीं, बल्कि कलंक बन चुका है। गांव के लोगों के अनुसार, नाम की वजह से न सिर्फ लड़कियों की शादियां टूट रही हैं, बल्कि युवाओं को नौकरी, शिक्षा और सामाजिक जीवन में भी अपमान और भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है।
ग्रामीण बताते हैं कि जब भी कहीं रिश्ता तय होता है, जैसे ही रूपवार तवायफ गांव का नाम सामने आता है, लड़के वाले बिना कोई और कारण बताए रिश्ता तोड़ देते हैं। कई मामलों में तो गांव का नाम सुनते ही लोग हंसी या नकारात्मक टिप्पणी करने लगते हैं। यही वजह है कि यहां रहने वाले लोग अपना गांव बताने में शर्मिंदगी महसूस करते हैं।

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नौकरी और पहचान में भी बाधा
गांव के युवा बताते हैं कि नौकरी के फॉर्म, इंटरव्यू या किसी आधिकारिक दस्तावेज में जब पता लिखने की बारी आती है, तो वे असहज हो जाते हैं। कई बार गांव का नाम ही रोजगार में बाधा बन जाता है। महिलाओं की स्थिति और भी संवेदनशील है—वे या तो गांव का नाम छुपाती हैं या फिर आधा-अधूरा पता बताने को मजबूर होती हैं। इससे उनका आत्मसम्मान और आत्मविश्वास दोनों प्रभावित हो रहे हैं।

नाम बदलने की मांग तेज
ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि उन्हें अपने इतिहास या पहचान से शर्म नहीं है, लेकिन अपमानजनक नाम के साथ जीना अब मुश्किल हो गया है। गांव के लोग चाहते हैं कि रूपवार तवायफ गांव का नाम बदला जाए और इसे देवपुर या किसी अन्य सम्मानजनक नाम से जाना जाए। उनका कहना है कि नाम बदलने से आने वाली पीढ़ियों को सामाजिक तिरस्कार नहीं झेलना पड़ेगा।

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“हमें शर्म नहीं, सम्मान चाहिए”
ग्रामीणों ने प्रशासन से अपील की है कि उनकी समस्या को गंभीरता से समझा जाए। उनका कहना है कि गांव का नाम बदलना सिर्फ औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सम्मान और गरिमा की वापसी है। लोगों का दर्द साफ शब्दों में झलकता है—“हमें शर्म नहीं, सम्मान चाहिए।”
सामाजिक बदलाव की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि नाम से जुड़ा सामाजिक प्रभाव वास्तविक होता है। ऐसे नाम, जिनसे नकारात्मक अर्थ जुड़ जाएं, समय के साथ लोगों के जीवन को प्रभावित करने लगते हैं। ऐसे में प्रशासनिक स्तर पर जनभावनाओं के अनुरूप निर्णय लेना जरूरी हो जाता है।
ग्रामीणों से बातचीत के बाद यह स्पष्ट है कि रूपवार तवायफ गांव का मुद्दा केवल नाम बदलने का नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान और समान अवसर का है। अब देखना यह है कि प्रशासन उनकी इस जायज मांग पर कब और कैसे कदम उठाता है।

Editor CP pandey

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