“सत्य, करुणा और विष्णु-भक्ति: कलियुग के लिए शास्त्रोक्त अमर संदेश”

“जब भक्त का विश्वास बना ढाल: श्रीहरि विष्णु की वह शास्त्रोक्त लीला जहाँ सत्य के लिए स्वयं ईश्वर अवतरित हुए”
📿 शास्त्रोक्त कथा धर्म, करुणा और नारायण-स्मरण की अमर विजय
धर्म केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन का वह दीप है जो अंधकार में भी मनुष्य को दिशा देता है। शास्त्र कहते हैं—
“धर्मो रक्षति रक्षितः”
अर्थात जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म स्वयं उसकी रक्षा करता है। हमने जाना कि ईश्वर मंदिर की मूर्ति तक सीमित नहीं, बल्कि उस करुण हृदय में वास करते हैं जो सत्य, दया और निस्वार्थ भाव से भरा हो।
अब एपिसोड–10 में वही विचार शास्त्रों की गहराई से निकलकर श्रीहरि विष्णु की दिव्य कथा के रूप में हमारे सामने आता है—एक ऐसी कथा, जो आज के युग में भी उतनी ही प्रासंगिक है।

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🌸 “सत्य, करुणा और विष्णु-भक्ति: कलियुग के लिए शास्त्रोक्त अमर संदेश”
विष्णु पुराण, भागवत पुराण और नारायणीय उपनिषद में भगवान विष्णु को सृष्टि के पालक के रूप में वर्णित किया गया है।
वे न केवल संसार का संतुलन बनाए रखते हैं, बल्कि जब-जब अधर्म बढ़ता है, तब-तब वे स्वयं किसी न किसी रूप में प्रकट होते हैं।
श्लोक—
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥”
यह केवल वचन नहीं, बल्कि ईश्वरीय प्रतिज्ञा है।

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📖 कथा का प्रारंभ: एक साधारण भक्त, असाधारण विश्वास
बहुत प्राचीन काल की बात है। सरस्वती नदी के तट पर एक छोटा सा आश्रम था।
वहाँ रहने वाला एक ब्राह्मण—नाम था सत्यव्रत।
न उसके पास अपार धन था, न राजाश्रय, न ही कोई चमत्कारी शक्ति।
उसके पास केवल एक चीज थी—

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👉 अडिग विश्वास और “नारायण” का अखंड स्मरण।
प्रतिदिन वह कहता—
“नारायण ही सब कुछ हैं।
वही माता, वही पिता, वही सखा, वही रक्षक।”
⚔️ अधर्म का उदय और सत्य की परीक्षा
उस क्षेत्र का राजा धीरे-धीरे अहंकार और अधर्म में डूब चुका था।
ब्राह्मणों पर कर, आश्रमों की भूमि पर कब्जा और धर्मग्रंथों का अपमान—यह सब आम हो गया था।
एक दिन राजा के सैनिक आश्रम पहुँचे।
आदेश था—आश्रम की भूमि राजकोष में दर्ज होगी।
सत्यव्रत ने विनम्र स्वर में कहा—
“यह भूमि मेरी नहीं, नारायण की है।
मैं इसे किसी अन्य को नहीं दे सकता।”
सैनिक हँसे, धमकाया, मारा-पीटा, पर सत्यव्रत का स्वर नहीं डगमगाया।

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🙏 जब मनुष्य हारता है, तब ईश्वर आगे आते हैं
अंततः सत्यव्रत को बंदी बना लिया गया।
कारागार में डाल दिया गया—भूखा, घायल, अकेला।
पर वह अकेला नहीं था।
कारागार की अंधेरी कोठरी में भी वह बस एक ही शब्द जप रहा था—
“नारायण… नारायण… नारायण…”
भागवत पुराण कहता है—
“नारायण-स्मरण मात्रेण मुक्तिर्भवति निश्चितम्।”
श्रीहरि की लीला: धर्म की प्रत्यक्ष विजय
उस रात नगर में अद्भुत घटनाएँ होने लगीं।
राजमहल काँप उठा, सैनिक भयभीत हो उठे, आकाश में दिव्य प्रकाश फैल गया।
राजा के स्वप्न में चतुर्भुज श्रीहरि विष्णु प्रकट हुए—
शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए।
गंभीर स्वर में कहा—
“जिसने मेरे भक्त को कष्ट दिया,
उसने स्वयं मुझे ललकारा है।”
प्रातः होते ही राजा को अपनी भूल का बोध हुआ।
वह स्वयं कारागार पहुँचा, सत्यव्रत के चरणों में गिर पड़ा।

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🌼 समानता और संदेश: आज के युग के लिए कथा का अर्थ
यह कथा केवल अतीत नहीं है।
यह आज के समाज के लिए आईना है।
आज भी—
जब कोई सत्य के लिए खड़ा होता है
जब कोई निस्वार्थ भाव से धर्म निभाता है
जब कोई अकेला होकर भी ईश्वर पर भरोसा करता है
👉 श्रीहरि विष्णु अदृश्य रूप से उसके साथ खड़े होते हैं।
🔔 एपिसोड–10 का केंद्रीय शास्त्रोक्त संदेश
धर्म पूजा से नहीं, आचरण से जीवित रहता है।
नारायण-स्मरण सबसे बड़ा कवच है।
ईश्वर शक्ति नहीं, विश्वास से प्रकट होते हैं।
सत्य के मार्ग पर चलने वाला कभी पराजित नहीं होता।
🌺 भावनात्मक समापन
जब संसार साथ छोड़ देता है,
जब अपने भी पराए हो जाते हैं,
तब यदि कोई साथ रहता है—
तो वह है “नारायण का नाम”।
जो आज भी कहता है—
“हे श्रीहरि, तू ही मेरा सहारा है।”
वह कभी, किसी भी काल में अकेला नहीं होता।

Editor CP pandey

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