(राष्ट्र की परम्परा | कहानी डेस्क | शशांक भूषण मिश्र)
ताकतवर होकर भी झुक जाना श्रेष्ठ गुण है, और श्रेष्ठ होकर भी सामान्य बने रहना सर्वश्रेष्ठ गुण। जीवन में कई बार ऐसे मोड़ आते हैं, जब इंसान चाहे तो बदला लेकर अपने ग़ुस्से को शांत कर सकता है, परंतु कुछ लोग माफ़ करना चुनते हैं—क्योंकि उन्हें पता होता है कि माफ़ कर देना किसी को छोटा नहीं बनाता, बल्कि भीतर से और अधिक सशक्त करता है।
इसी भाव को उजागर करती है यह कहानी—जो आपको भीतर तक स्पर्श करेगी।
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कहानी : “माफ़ी की ताकत”
गाँव का नाम था चाँदपुर, और वहीं रहता था दीपक—एक सामान्य परिवार का, शांत स्वभाव वाला, लेकिन अत्यंत तेज दिमाग और मेहनती युवा। गाँव के लोग उसे सम्मान देते थे क्योंकि वह अपनी सफलता का घमंड कभी नहीं करता था। उसके स्वभाव में विनम्रता, व्यवहार में शांति और आँखों में दुनिया बदलने का सपना था।
पर जहाँ सादगी होती है, वहाँ कुछ लोगों की ईर्ष्या भी जन्म लेती है।
गाँव का ही युवक राजीव, जो स्वभाव से अहंकारी और तनिक कठोर था, दीपक की बढ़ती लोकप्रियता से भीतर ही भीतर जलने लगा। कभी किसी बैठक में अपमानित कर देता, कभी उसकी किसी उपलब्धि का मज़ाक उड़ाता। कई बार मौका देखकर उसके काम में बाधाएँ भी खड़ी करता।
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लोग समझते थे कि दोनों के बीच एक दिन टकराव अवश्य होगा।
पर दीपक हर बार मुस्कुराकर चुप रह जाता।
लेकिन एक दिन बात हद से आगे बढ़ गई।
एक दिन की घटना जिसने कहानी बदल दी
गाँव में एक बड़ा सामाजिक समारोह था। दीपक को मंच संचालन का दायित्व दिया गया था। पर राजीव ने जानबूझकर सभी के सामने दीपक पर झूठा आरोप लगा दिया कि वह कार्यक्रम के पैसे में गड़बड़ी कर रहा है। भीड़ कुछ क्षणों के लिए सन्न रह गई।
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दीपक के सामने दो रास्ते थे—
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