कैलाश सिंह
महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)। किसी भी राष्ट्र की मजबूती ऊंची इमारतों, बड़े बजट और नारों से नहीं, बल्कि उसकी जनता के जीवन स्तर से आंकी जाती है। यह जीवन स्तर मुख्यतः तीन आधारों पर टिका होता है—स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा। अगर ये तीनों मजबूत हों तो राष्ट्र प्रगति की राह पर होता है, और अगर इनमें से कोई भी कमजोर पड़ जाए तो पतन तय हो जाता है।
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स्वास्थ्य व्यवस्था राष्ट्र की रीढ़ है। एक बीमार समाज न तो उत्पादक हो सकता है और न ही सशक्त। सरकारी अस्पतालों की स्थिति, डॉक्टरों की उपलब्धता, दवाइयों और इलाज तक आम नागरिक की पहुंच—यही तय करता है कि विकास वास्तव में जमीन पर उतरा है या सिर्फ आंकड़ों में सिमटा है। जब बीमारी गरीबी को जन्म देती है और इलाज कर्ज का कारण बन जाए, तब समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था विफल हो रही है। शिक्षा राष्ट्र का भविष्य गढ़ती है। गुणवत्तापूर्ण और समान शिक्षा के बिना आत्मनिर्भर समाज की कल्पना अधूरी है।शिक्षा केवल डिग्री पाने का साधन नहीं, बल्कि सोचने, समझने और सही-गलत में फर्क करने की क्षमता विकसित करती है। लेकिन जब शिक्षा संसाधनों और सुविधा पर निर्भर हो जाए, तब सामाजिक असमानता और गहरी हो जाती है। कमजोर शिक्षा व्यवस्था सीधे तौर पर राष्ट्र के पतन की नींव रख देती है। सुरक्षा व्यवस्था जनता में विश्वास पैदा करती है कानून- व्यवस्था सुदृढ़ हो, न्याय समय पर मिले और नागरिक खुद को सुरक्षित महसूस करें—यही किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है। जब अपराध बढ़ें, न्याय में देरी हो और आम आदमी भय में जीवन बिताए, तो विकास स्वतः रुक जाता है।
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इन तीनों आधारों में संतुलन ही राष्ट्र की सच्ची ताकत है। स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा में से किसी एक की उपेक्षा बाकी दो को भी कमजोर कर देती है। इसलिए नीति निर्माण में प्राथमिकता तय करते समय सरकारों को यह समझना होगा कि राष्ट्र का उत्थान या पतन इन्हीं बुनियादी व्यवस्थाओं पर निर्भर करता है। आज समय है कि विकास की परिभाषा को फिर से परखा जाए। अगर आम नागरिक स्वस्थ, शिक्षित और सुरक्षित नहीं है, तो किसी भी राष्ट्र को प्रगतिशील कहना महज भ्रम होगा।
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