भारतीय ऋतुओं में वसंत ऋतु केवल मौसम नहीं, बल्कि जीवन में नवचेतना का उत्सव है। फागुन–चैत के आते ही खेत-खलिहान, बाग-बगीचे, वन-उपवन और जन-मन—सब उल्लास से भर उठते हैं। इसी अनुभूति को शब्दों में ढालती यह कविता फागुन चैत की बाज उठी शहनाई प्रकृति, होली और मानवीय संवेदना का सुंदर संगम प्रस्तुत करती है।
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विद्यावाचस्पति डा० कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
फागुन–चैत की बज उठी शहनाई
कविता
लखपेड़ा बाग आमों की है बौराई,
वसन्त ऋतु आम्रकुंज की अमराई,
बौरों की भीनी भीनी ख़ुशबू महके,
फागुन, चैत की बज उठी शहनाई।
पतझड़ बीत गया है शिशिर का,
मधुमास की बेला चमेली महकी,
होली के गीत और राग रंग बरसें,
वन उपवन कोयलिया हैं चहकें।
नीम,पीपल, वटवृक्ष,गूलर, महुआ,
पेड़ों में नव नूतन किसलय कोमल,
गुलाबास, गुलखैरा, गुलाब खिल रहे,
नींबू,नारंगी रंग रंगीले अनार फल रहे।
होलिकादहन, फगुवा गायन वादन,
ढोल, मंजीरा, झाँझ और ढप थापें,
युवक, युवतियाँ, बच्चे बूढ़े सब नाचें,
होली के रंग गुलाल अबीर लगा खेलें।
आदित्य बसन्त ऋतु सुहानी आई,
खिल उठी आम्रकुंज की अमराई,
मन मयूर उमंगित हो नृत्य कर रहा,
हृदय में अनुभूति हो रही तरुणाई।
— विद्यावाचस्पति डा० कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
विश्लेषण और महत्व
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यह रचना फागुन चैत की बज उठी शहनाई के भाव से वसंत का स्वागत करती है। आमों की बौर, कोयल की कूक, होली का फगुआ, ढोल-मंजीरे की थाप—सब मिलकर ग्रामीण भारत की जीवंत तस्वीर रचते हैं। कविता में प्रकृति के साथ समाज, संस्कृति और उत्सव का समन्वय पाठक को सीधे अनुभूति से जोड़ता है।
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