कैलाश सिंह
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। लोकतंत्र में सत्ता तक पहुंचने का रास्ता अक्सर वादों से होकर गुजरता है। सरकारें विकास के सपने दिखाकर जनता से विश्वास मांगती हैं, लेकिन मौजूदा दौर की हकीकत यह है कि वादों की आंधी इतनी तेज हो गई है कि विकास की राह ठहर-सी गई है। घोषणाएं लगातार होती हैं, योजनाएं मंचों से उतरती हैं, मगर जमीनी स्तर पर उनका असर दिखाई देना मुश्किल होता जा रहा है।
हर चुनाव से पहले रोजगार, महंगाई नियंत्रण, बेहतर शिक्षा, मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था और सुरक्षित भविष्य जैसे बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। लेकिन सत्ता संभालते ही प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। योजनाएं फाइलों में उलझ जाती हैं और जवाबदेही का बोझ एक-दूसरे पर टाल दिया जाता है। नतीजतन विकास की गाड़ी आगे बढ़ने के बजाय कागजों में ही दौड़ती नजर आती है।
ग्रामीण इलाकों की स्थिति आज भी चिंताजनक बनी हुई है। कई क्षेत्रों में सड़क, स्वच्छ पेयजल और स्वास्थ्य सेवाएं अधूरी हैं। युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। किसान बढ़ती लागत और घटती आय के बीच फंसा हुआ है, जबकि महंगाई ने आम आदमी की थाली से स्वाद और संतुलन दोनों छीन लिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर नीतियां इतनी प्रभावी हैं, तो आम जनजीवन में सुधार क्यों नहीं दिखता?
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सरकारों को यह समझना होगा कि जनता को अब नारों की नहीं, ठोस नतीजों की जरूरत है। विकास केवल भाषणों, पोस्टरों और विज्ञापनों से नहीं आता, बल्कि ईमानदार क्रियान्वयन, पारदर्शी प्रशासन और मजबूत इच्छाशक्ति से आता है। यदि वादों की आंधी में विकास की राह यूं ही ठहरी रही, तो लोकतंत्र पर जनता का भरोसा कमजोर होना तय है।
अब समय आ गया है कि सरकारें शब्दों से आगे बढ़ें, योजनाओं को धरातल पर उतारें और जनहित को राजनीति से ऊपर रखें। क्योंकि विकास की राह तभी आगे बढ़ेगी, जब वादों की आंधी थमेगी और काम की सच्ची हवा चलेगी।
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