जब अधर्म ने तोड़ी सभी सीमाएँ और धर्म की पुनर्स्थापना का संकल्प जागा
पिछले एपिसोड में हमने जाना कि किस प्रकार कठिन समय में भी आशा का दीप बुझता नहीं, क्योंकि सृष्टि का संतुलन स्वयं ईश्वर के विधान से सुरक्षित रहता है। अधर्म चाहे जितनी भी शक्ति ग्रहण कर ले, अंततः पराजय उसी की होती है। अब हम उस शास्त्रोक्त प्रसंग की ओर बढ़ते हैं, जहाँ अधर्म अपने चरम पर पहुँच चुका था और भगवन विष्णु का अवतरण सृष्टि की रक्षा के लिए सुनिश्चित हो चुका था।
धरती काँप रही थी, आकाश उदास था, नदियों का प्रवाह रुक सा गया था और प्राणियों के हृदय में भय का अंधकार गहराता जा रहा था। धर्म के स्तंभ कमजोर पड़ चुके थे। असुरों का आतंक चारों ओर व्याप्त हो चुका था। देवगण पराजित और निराश हो चुके थे। यज्ञ रुक गए थे, वेदों के स्वरों पर मौन छा चुका था और पूजा स्थलों पर सन्नाटा पसरा था।
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असुरों का राजा कालकेय नामक महाबली, स्वयं को ईश्वर से भी श्रेष्ठ समझने लगा था। उसने समस्त राज्यों पर अधिकार जमाकर धर्म के मार्ग को कुचलने का प्रयत्न किया। मंदिरों को अपवित्र किया गया, साधु-संतों को तिरस्कृत किया गया और मासूम प्राणियों पर अत्याचार किया गया। पृथ्वी माता करुण विलाप कर रही थी।
तब सभी देवता, ब्रह्मा, शिव और अन्य दिव्य शक्तियाँ, क्षीरसागर में भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे।
देवताओं ने प्रार्थना की—
“हे पालनहार! हे जगत के रक्षक! अब यह धरा अधर्म का भार सहने में असमर्थ हो चुकी है। कृपा करके अवतार लेकर संसार का कल्याण कीजिए।”
भगवान विष्णु ने अपने शांत, गंभीर और दिव्य स्वर में कहा—
“हे देवगण, जब-जब धरती पर अधर्म बढ़ता है और धर्म का विनाश होने लगता है, तब-तब मैं स्वयं अवतार लेकर संतुलन की स्थापना करता हूँ। यह युग भी उसी चरण पर खड़ा है। मैं मानव रूप में धरती पर जन्म लूँगा और अधर्म का विनाश करूँगा।”
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यह कहते ही क्षीरसागर प्रकाश से भर गया। एक अलौकिक ऊर्जा संपूर्ण ब्रह्मांड में प्रवाहित होने लगी। ऋषि-मुनियों को ध्यान में संकेत मिलने लगे कि भगवान विष्णु का नया अवतार शीघ्र आने वाला है।
धरती पर एक धर्मनिष्ठ राजा और सत्यवती नामक रानी थीं। वे वर्षों से संतान सुख के लिए तप कर रहे थे। उन्हीं के घर भगवान विष्णु ने बालक के रूप में जन्म लेने का संकल्प लिया। जिस रात वह बालक जन्मा, वह रात्रि साधारण नहीं थी—आकाश में दिव्य नक्षत्रों की रचना बन गई, पुष्पों की वर्षा होने लगी और दिशा-दिशा में मंगल ध्वनि गूँज उठी।
बालक के जन्म लेते ही उसके तेज से पूरा महल प्रकाशित हो गया। उसके मुख पर ऐसी दिव्यता थी मानो स्वयं सूर्य और चंद्रमा की छाया उसमें समा गई हो। ऋषि-मुनियों ने घोषणा कर दी—
“यह बालक साधारण मानव नहीं, स्वयं विष्णु का अंश है। यही अधर्म का विनाशक और धर्म का पुनर्स्थापक बनेगा।”
समय के साथ वह बालक बड़ा होने लगा। उसकी आँखों में सागर की गहराई, मुख पर करुणा और हृदय में असीम साहस था। वह कभी वन में जाकर ऋषियों से ज्ञान प्राप्त करता, कभी शस्त्र विद्या सीखता और कभी पीड़ितों की रक्षा करता। उसका नाम पड़ा — धर्मप्रकाश।
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उधर, असुर राजा कालकेय को आकाशवाणी से ज्ञात हुआ कि भगवान विष्णु मानव रूप में जन्म ले चुके हैं। यह सुनते ही उसका क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने प्रतिज्ञा की कि वह उस बालक को खोजकर नष्ट कर देगा।
असुरों की सेना गाँव-गाँव, नगर-नगर में उस बालक की तलाश करने लगी। हर जगह भय और आतंक फैलने लगा। किन्तु धर्मप्रकाश का संकल्प अडिग था। वह जान चुका था कि उसका जन्म किसी सामान्य उद्देश्य के लिए नहीं हुआ है।
एक दिन वह असुरों के अत्याचार से पीड़ित एक गाँव पहुँचा। वहाँ का दृश्य हृदयविदारक था—घर जले हुए, जलस्रोत सूखे हुए और स्त्रियाँ रोती हुईं। तब धर्मप्रकाश का तेज प्रज्वलित हुआ। उसने अपनी दिव्य शक्ति का प्रथम प्रदर्शन करते हुए अकेले ही दर्जनों असुरों को परास्त कर दिया।
लोगों की आँखों में आशा की किरण जाग उठी। पहली बार उन्हें महसूस हुआ कि ईश्वर उनके साथ है।
यही वह क्षण था जब अधर्म को यह आभास हुआ कि उसका अंत अब निकट है।
और यहीं से आरंभ होती है वह महासंग्राम, जिसकी गाथा हम एपिसोड 5 में विस्तार से जानेंगे– जहाँ भगवान विष्णु का यह अवतार, न केवल अस्त्र-शस्त्र से, बल्कि करुणा, धर्म और सत्य की ताकत से अधर्म की जड़ों को उखाड़ फेंकता है।
यह कथा हमें सिखाती है कि:
सच्चाई कभी हारती नहीं ,अन्याय कितना भी बड़ा हो, अंत में जीत धर्म की होती है,ईश्वर हर युग में किसी न किसी रूप में हमारे साथ रहते हैं,“जहाँ आस्था होती है, वहाँ भगवान स्वयं मार्ग बनाते हैं।”
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