मां वैष्णो देवी का बुलावा, धारी देवी की अनोखी मान्यता और ज्वाला देवी की अखंड ज्योति—नवरात्रि पर जानिए तीनों शक्तिस्वरूपा देवियों की महिमा

जानिए कलश स्थापना का मुहूर्त और संपूर्ण पूजा विधि

लेखक: पंडित सुधीर तिवारी ‘अंतिम बाबा’

शारदीय नवरात्रि 2026 विशेष | धर्म-अध्यात्म | राष्ट्र की परम्परा

नवरात्रि भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा और शक्ति उपासना का ऐसा पावन पर्व है, जिसमें श्रद्धा, साधना, संयम और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना के लिए समर्पित यह पर्व भक्तों को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करने के साथ ही जीवन में सकारात्मकता, साहस और आत्मविश्वास का संदेश देता है। शारदीय नवरात्रि के प्रथम दिन कलश स्थापना के साथ देवी आराधना का शुभारंभ होता है। घरों से लेकर मंदिरों तक मां के जयकारे गूंजते हैं और भक्त सुख, शांति, समृद्धि तथा परिवार के कल्याण की कामना करते हैं।

वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 11 अक्टूबर से मानी जा रही है। इस दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाएगी। घट स्थापना को नवरात्रि पूजा का महत्वपूर्ण आरंभ माना जाता है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, विधिपूर्वक कलश स्थापित करके देवी का आह्वान किया जाता है और नौ दिनों तक नियमित पूजा-अर्चना, मंत्र जाप, आरती तथा व्रत के माध्यम से माता की आराधना की जाती है। नवरात्रि के पहले दिन घट स्थापना का विशेष महत्व

सनातन धर्म में कलश को मंगल, समृद्धि, पवित्रता और दैवीय ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। नवरात्रि के प्रथम दिन कलश स्थापना करके भक्त अपने घर में देवी शक्ति का स्वागत करते हैं। मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई पूजा से मन को शांति मिलती है तथा व्यक्ति में कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति विकसित होती है।

प्रचलित पंचांग संबंधी जानकारी के अनुसार, 11 अक्टूबर 2026 को कलश स्थापना का सुबह का मुहूर्त प्रातः 6 बजकर 19 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक बताया जा रहा है। इस अवधि के अनुसार घट स्थापना के लिए 3 घंटे 53 मिनट का समय उपलब्ध होगा। हालांकि, पूजा का अंतिम मुहूर्त निर्धारित करने से पहले स्थानीय पंचांग, सूर्योदय और क्षेत्रीय समय की पुष्टि अवश्य कर लें। तिथि तथा मुहूर्त की गणना स्थान के अनुसार अलग हो सकती है।

मां शैलपुत्री की पूजा से शुरू होगी नौ दिवसीय साधना

नवरात्रि के प्रथम दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की उपासना की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं। उनका वाहन वृषभ अर्थात बैल है। उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल सुशोभित होता है। उन्हें प्रकृति, दृढ़ता, पवित्रता और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

मां शैलपुत्री की पूजा करने वाले श्रद्धालु अपने जीवन में स्थिरता, स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और मानसिक शांति की कामना करते हैं। पूजा के लिए प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को साफ करें और मां दुर्गा की प्रतिमा अथवा तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद दीपक जलाकर मां शैलपुत्री का ध्यान करें और उन्हें पुष्प, अक्षत, फल तथा अपनी श्रद्धा के अनुसार भोग अर्पित करें। पूजा के अंत में आरती करें और परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करें।

कलश स्थापना की संपूर्ण विधि, इन सामग्रियों को पहले से रखें तैयार

घट स्थापना से पहले पूजा की आवश्यक सामग्री जुटा लेने से पूजा व्यवस्थित तरीके से संपन्न होती है। इसके लिए तांबे, पीतल या मिट्टी का कलश, स्वच्छ जल, गंगाजल, आम अथवा अशोक के पत्ते, जटा वाला नारियल, लाल कपड़ा या चुनरी, रोली, मौली, अक्षत, सुपारी, सिक्का, फूल, माला, धूप, दीपक, घी और फल तैयार रखें। यदि आपके घर में जौ बोने की परंपरा है, तो मिट्टी, मिट्टी का पात्र और जौ के दाने भी रख लें।

पहला चरण—पूजा स्थल की सफाई: नवरात्रि के पहले दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा स्थल की सफाई करके वहां गंगाजल छिड़कें। एक साफ चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर मां दुर्गा की तस्वीर अथवा प्रतिमा स्थापित करें।

दूसरा चरण—जौ बोने की परंपरा: मिट्टी के पात्र में स्वच्छ मिट्टी डालें और उसमें जौ के दाने बो दें। हल्का पानी छिड़कें। नवरात्रि के नौ दिनों तक जौ में उचित नमी बनाए रखें। परंपरागत रूप से उगते हुए जवारे को शुभता, उर्वरता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

तीसरा चरण—कलश तैयार करना: कलश को साफ करके उसमें स्वच्छ जल भरें। परिवार की परंपरा के अनुसार उसमें गंगाजल, सुपारी, अक्षत या सिक्का रखा जा सकता है। कलश के मुख पर आम अथवा अशोक के पत्ते लगाएं। इसके ऊपर लाल कपड़े में लिपटा जटा वाला नारियल स्थापित करें। ध्यान रखें कि कलश स्थिर स्थान पर रखा हो और उसके गिरने की आशंका न हो।

चौथा चरण—घट स्थापना और संकल्प: तैयार कलश को पूजा स्थल पर जौ के पात्र के समीप स्थापित करें। मां दुर्गा का ध्यान करते हुए नवरात्रि पूजा का संकल्प लें। इसके बाद मां शैलपुत्री को पुष्प, अक्षत, फल और भोग अर्पित करें। दीपक तथा धूप जलाकर मंत्र जाप, दुर्गा चालीसा या देवी स्तुति का पाठ करें। अंत में आरती करके सभी के कल्याण की प्रार्थना करें।

पूजा की विधि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में कुछ भिन्न हो सकती है। इसलिए अपनी कुल परंपरा और श्रद्धा के अनुसार पूजा करना उचित है। सबसे महत्वपूर्ण है स्वच्छता, संयम, श्रद्धा और सच्चे मन से देवी का स्मरण।

नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना

नवरात्रि के नौ दिन देवी शक्ति के नौ स्वरूपों को समर्पित हैं। प्रथम दिन मां शैलपुत्री, दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी, तीसरे दिन मां चंद्रघंटा, चौथे दिन मां कूष्मांडा, पांचवें दिन मां स्कंदमाता, छठे दिन मां कात्यायनी, सातवें दिन मां कालरात्रि, आठवें दिन मां महागौरी और नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है।

इन नौ स्वरूपों की आराधना जीवन में साहस, तपस्या, विवेक, मातृत्व, निर्भयता, पवित्रता और आध्यात्मिक उन्नति जैसे गुणों का स्मरण कराती है। नवरात्रि में कुछ श्रद्धालु नौ दिनों तक व्रत रखते हैं, जबकि कुछ पहले और अंतिम दिन उपवास करते हैं। मंदिरों तथा घरों में सुबह-शाम पूजा और आरती होती है। व्रत के दौरान भोजन, फलाहार और पूजा संबंधी नियमों का पालन अपनी पारिवारिक एवं क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार किया जाता है।

मां वैष्णो देवी का बुलावा—आस्था, विश्वास और त्रिकुट पर्वत की महिमा

भारत के प्रमुख तीर्थस्थलों में जम्मू-कश्मीर के कटरा के निकट स्थित मां वैष्णो देवी का दरबार विशेष स्थान रखता है। त्रिकुट पर्वत पर स्थित पवित्र भवन में दर्शन के लिए हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्तों के बीच यह मान्यता अत्यंत प्रचलित है कि मां वैष्णो देवी के दर्शन के लिए उनका बुलावा आना आवश्यक होता है।

आस्था से जुड़े इस विश्वास का भाव यह है कि जब भक्त के मन में मां के दर्शन की प्रबल इच्छा जागती है और यात्रा के लिए परिस्थितियां अनुकूल होने लगती हैं, तो वह इसे माता रानी की कृपा के रूप में देखता है। कई बार वर्षों से टल रही यात्रा अचानक संभव हो जाती है। कभी किसी परिचित से यात्रा का निमंत्रण मिलता है, तो कभी मां के दर्शन से जुड़ी तस्वीरें, वीडियो या धार्मिक प्रसंग मन में भक्ति का भाव जगा देते हैं। श्रद्धालु ऐसे अनुभवों को मां के बुलावे से जोड़ते हैं।

यह धार्मिक आस्था का विषय है, जिसका अनुभव प्रत्येक भक्त अपने तरीके से करता है। मां वैष्णो देवी के पवित्र भवन में महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती की संयुक्त शक्ति के प्रतीक रूप में तीन पवित्र पिंडियों के दर्शन किए जाते हैं। इन्हें देवी की सृजनात्मक, संरक्षणकारी और शक्ति प्रदान करने वाली ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालु मां के दरबार में पहुंचकर सुख-समृद्धि, साहस, शांति और परिवार के मंगल की कामना करते हैं।

कटरा से मां के भवन तक की यात्रा पर्वतीय मार्ग से होकर गुजरती है। श्रद्धालु अपनी शारीरिक क्षमता और उपलब्ध सुविधाओं के अनुसार पैदल यात्रा अथवा अन्य अनुमत साधनों का उपयोग करते हैं। यात्रा के दौरान अनुशासन, स्वच्छता, सुरक्षा निर्देशों और प्रशासन की सलाह का पालन करना आवश्यक है।

धारी देवी मंदिर: उत्तराखंड की रक्षक देवी से जुड़ी मान्यताएं

देवभूमि उत्तराखंड में अलकनंदा नदी के निकट स्थित धारी देवी मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र है। मां धारी देवी को मुख्यतः देवी काली के स्वरूप में पूजा जाता है। स्थानीय धार्मिक परंपराओं में उन्हें उत्तराखंड की रक्षक देवी और चारधाम यात्रा की संरक्षिका के रूप में सम्मान दिया जाता है।

धारी देवी मंदिर से जुड़ी एक प्रसिद्ध मान्यता यह है कि यहां विराजमान देवी की प्रतिमा सुबह, दोपहर और शाम को अलग-अलग स्वरूपों में दिखाई देती है। श्रद्धालुओं की मान्यता के अनुसार, सुबह देवी बालिका, दिन में युवती अथवा महिला और शाम को वृद्धा के स्वरूप में दिखाई देती हैं। यह विश्वास मंदिर की विशिष्ट धार्मिक पहचान का हिस्सा है।

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भीषण बाढ़ के दौरान देवी की प्रतिमा बहकर धारो गांव के निकट एक चट्टान पर आकर रुक गई। लोककथा में कहा जाता है कि ग्रामीणों को प्रतिमा की ओर से विलाप जैसी आवाज सुनाई दी और उन्हें उसी स्थान पर देवी की स्थापना करने का संकेत मिला। इसके बाद ग्रामीणों ने वहां प्रतिमा स्थापित की और धीरे-धीरे यह स्थान प्रमुख धार्मिक केंद्र बन गया।

वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा से पहले धारी देवी की प्रतिमा को पुराने स्थान से हटाकर अस्थायी रूप से स्थानांतरित किए जाने की घटना भी व्यापक चर्चा में रही। कुछ स्थानीय श्रद्धालु इस घटना और बाद की प्राकृतिक आपदा के बीच धार्मिक संबंध मानते हैं। हालांकि, ऐसी मान्यताओं को आस्था और लोकविश्वास के रूप में ही समझना चाहिए; प्राकृतिक आपदाओं के कारणों को वैज्ञानिक तथा भौगोलिक तथ्यों के आधार पर समझा जाता है।

धारी देवी मंदिर की एक अन्य विशेषता यह है कि यहां देवी के ऊपरी स्वरूप की पूजा होती है, जबकि रुद्रप्रयाग के कालीमठ में देवी के निचले स्वरूप से संबंधित धार्मिक परंपरा प्रचलित है। नवरात्रि के अवसर पर मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और दूर-दूर से भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

मां ज्वाला देवी मंदिर—बिना तेल और बाती के प्रज्वलित ज्वालाओं की आस्था

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित मां ज्वाला देवी मंदिर प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है। यह मंदिर देवी शक्ति की उपासना के लिए प्रसिद्ध है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवी सती के शरीर के अंग भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से विभक्त होने के बाद विभिन्न स्थानों पर गिरे और उन स्थानों पर शक्तिपीठ स्थापित हुए। ज्वाला देवी मंदिर को देवी सती की जिह्वा से जोड़ने वाली मान्यता प्रचलित है।

मंदिर की सबसे विशिष्ट विशेषता प्राकृतिक रूप से निकलने वाली ज्वालाएं हैं, जिनकी श्रद्धालु देवी के दिव्य स्वरूप के रूप में पूजा करते हैं। यहां तेल या बाती से प्रज्वलित सामान्य दीपक के स्थान पर प्राकृतिक ज्वालाओं के दर्शन का विशेष महत्व है। मंदिर में अन्नपूर्णा, हिंगलाज, चंडी, विंध्यवासिनी, सरस्वती, महालक्ष्मी, अंबिका और अंजी देवी सहित विभिन्न देवी स्वरूपों से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं भी प्रचलित हैं।

भक्त गोरखनाथ और ज्वाला देवी की पौराणिक कथा

लोकप्रचलित कथा के अनुसार, महान योगी गुरु गोरखनाथ मां ज्वाला देवी के परम भक्त थे। एक बार उन्हें तेज भूख लगी, तो उन्होंने माता से पानी गर्म करने और भोजन की व्यवस्था करने की बात कही। मान्यता है कि माता ने अग्नि प्रज्वलित की और गुरु गोरखनाथ भिक्षा लेने चले गए। वह वापस नहीं लौटे और देवी की ज्वाला निरंतर प्रज्वलित रहने की धार्मिक कथा प्रचलित हो गई। भक्त विश्वास करते हैं कि यह ज्वाला देवी की अनंत शक्ति का प्रतीक है।

मंदिर के समीप स्थित गोरख डिब्बी भी श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र है। लोकमान्यता के अनुसार, इस स्थान पर पानी उबलता हुआ दिखाई देता है, लेकिन छूने पर ठंडा महसूस होता है। ऐसे धार्मिक स्थलों से जुड़ी मान्यताएं पीढ़ियों से भक्तों के बीच प्रचलित हैं। किसी भी असामान्य प्राकृतिक घटना के कारणों का निर्धारण वैज्ञानिक परीक्षणों से ही किया जा सकता है।

अकबर और स्वर्ण छत्र की कथा

मां ज्वाला देवी मंदिर से जुड़ी एक अन्य प्रसिद्ध लोककथा मुगल सम्राट अकबर के समय की बताई जाती है। मान्यता के अनुसार, अकबर ने मंदिर की ज्वालाओं को बुझाने के लिए अलग-अलग उपाय किए, लेकिन वह सफल नहीं हुआ। इसके बाद उसने देवी को सोने का छत्र अर्पित किया। कथा में कहा जाता है कि वह छत्र बाद में किसी अन्य धातु जैसा दिखाई देने लगा। श्रद्धालु इस प्रसंग को देवी की महिमा और अकबर के अहंकार के समाप्त होने से जोड़कर देखते हैं। हालांकि, इस घटना के विवरण को ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित तथ्य के बजाय धार्मिक लोककथा के रूप में प्रस्तुत करना उचित है।

नवरात्रि का संदेश: शक्ति के साथ सदाचार और सेवा का संकल्प

शारदीय नवरात्रि केवल पूजा, व्रत और धार्मिक अनुष्ठानों का पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि, अनुशासन, सेवा और सदाचार को जीवन में अपनाने का अवसर भी है। मां शैलपुत्री की दृढ़ता, मां वैष्णो देवी की शक्ति, धारी देवी की रक्षक स्वरूप में प्रतिष्ठा और मां ज्वाला देवी की अखंड ज्योति भक्तों को आस्था के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने की प्रेरणा देती हैं।

नवरात्रि में घर और मंदिरों को सजाया जाता है, कन्या पूजन किया जाता है, जरूरतमंदों को भोजन और वस्त्र दिए जाते हैं तथा सामूहिक रूप से देवी की आराधना की जाती है। इन परंपराओं का मूल भाव समाज में करुणा, समानता, सहयोग और सद्भाव को बढ़ावा देना है।

इस पावन पर्व पर श्रद्धालुओं को चाहिए कि वे पूजा के साथ अपने आचरण में भी सकारात्मक परिवर्तन लाएं। महिलाओं का सम्मान, जरूरतमंदों की सहायता, प्रकृति की रक्षा और परिवार में प्रेम तथा सद्भाव बनाए रखना देवी उपासना की भावना को जीवन में उतारने के महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

निष्कर्षतः, शारदीय नवरात्रि 2026 श्रद्धालुओं के लिए मां दुर्गा की आराधना, कलश स्थापना और आध्यात्मिक साधना का विशेष अवसर है। मां शैलपुत्री की पूजा से आरंभ होने वाली नौ दिवसीय साधना भक्तों को आत्मबल और सकारात्मकता का संदेश देती है। मां वैष्णो देवी, धारी देवी और ज्वाला देवी से जुड़ी पौराणिक कथाएं भारतीय धार्मिक परंपरा की समृद्ध विरासत को दर्शाती हैं। श्रद्धा, विवेक, सेवा और सदाचार के साथ मनाया गया नवरात्रि पर्व जीवन में नई ऊर्जा और मंगलकामना का संचार करता है।

लेखक: पंडित सुधीर तिवारी ‘अंतिम बाबा’

राष्ट्र की परम्परा परिवार की ओर से सभी श्रद्धालुओं को शारदीय नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं। जय माता दी!


Editor CP pandey

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