धर्मांतरण का धंधा विदेशी फंडिंग और सामाजिक विघटन का षड्यंत्र

उत्तर प्रदेश में एटीएस ने एक बड़े धर्मांतरण रैकेट का खुलासा किया है, जिसमें विदेशी फंडिंग के जरिए करीब 100 करोड़ रुपये 40 खातों में भेजे गए। मुख्य आरोपी ‘छांगरू बाबा’ उर्फ जमशेदुद्दीन के नेतृत्व में यह गिरोह ऊंची जाति की लड़कियों के लिए 15-16 लाख रुपये की दर से धर्मांतरण कराता था। यह मामला केवल आस्था नहीं, बल्कि एक सुनियोजित सामाजिक षड्यंत्र है जो जाति, धर्म और लिंग के आधार पर राष्ट्र की एकता को तोड़ने का प्रयास करता है। इसे धार्मिक स्वतंत्रता नहीं, संगठित अपराध के रूप में देखा जाना चाहिए।
धर्म किसी भी समाज की आत्मा होता है, लेकिन जब धर्म का प्रयोग ‘धंधे’ में बदल जाए तो सवाल सिर्फ आस्था का नहीं, राष्ट्र की सुरक्षा, सामाजिक समरसता और नैतिक मूल्यों का हो जाता है। उत्तर प्रदेश में एटीएस द्वारा उजागर किए गए एक बड़े धर्मांतरण रैकेट ने यही भयावह सच्चाई हमारे सामने रखी है। कथित रूप से “छांगरू बाबा” उर्फ जमशेदुद्दीन के नेतृत्व में यह गिरोह न केवल भोले-भाले लोगों का धर्मांतरण कर रहा था, बल्कि इसके पीछे एक व्यवस्थित नेटवर्क, विदेशी फंडिंग और जातिगत लक्ष्य निर्धारण भी शामिल था।
जिस प्रकार से इस रैकेट की कार्यप्रणाली सामने आई है, वह धर्मांतरण को एक सुनियोजित व्यवसाय के रूप में प्रकट करती है। यह कोई व्यक्तिगत आस्था का निर्णय नहीं, बल्कि विदेशी पैसों से संचालित एक मिशन था – जिसमें धर्म, जाति, स्त्री और समाज को एक वस्तु की तरह देखा गया। एफआईआर और जांच रिपोर्ट के अनुसार, धर्मांतरण के लिए बाकायदा ‘रेट कार्ड’ था। ऊंची जाति की लड़कियों के लिए धर्मांतरण की दर 15-16 लाख रुपये तक थी, जबकि अन्य लड़कियों के लिए 8-10 लाख रुपये। सोचिए, जब धर्म को भी जाति और लिंग के आधार पर मूल्यांकित किया जाने लगे, तो वह किस स्तर तक गिरावट का प्रतीक बनता है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि इस रैकेट के पास 40 बैंक खाते थे जिनमें विदेशों से 100 करोड़ रुपये से अधिक की रकम भेजी गई। यह रकम किसके इशारे पर भेजी गई, किन उद्देश्यों के लिए, और किन देशों से – यह सवाल सिर्फ जांच एजेंसियों के नहीं, पूरे देश के हैं। क्या यह केवल धर्मांतरण के लिए था या इसके पीछे कोई और बड़ा वैश्विक, राजनीतिक या वैचारिक षड्यंत्र भी छिपा है?
इस रैकेट की कार्यशैली में सोशल मीडिया का जबरदस्त उपयोग किया गया। वीडियो, मोटिवेशनल भाषण, ‘इस्लाम कबूल करने से मिली राहत’ जैसे फर्जी वीडियो वायरल कर कमजोर तबकों को बरगलाया गया। पहले मानसिक रूप से प्रभावित किया गया, फिर आर्थिक लालच दिया गया और अंत में जबरन धर्मांतरण। यह साइकोलॉजिकल वॉरफेयर जैसा है – जहां पहले मस्तिष्क जीता जाता है, फिर शरीर। और सबसे दुखद यह कि इसे धर्म का नाम दिया गया।
इस प्रकरण में बलरामपुर जिले के एक पूरे परिवार के धर्मांतरण की पुष्टि हुई है। वहां महिलाओं और बच्चों को टारगेट कर उन्हें धर्म बदलने के लिए मजबूर किया गया। यह कोई एक अपवाद नहीं, बल्कि उसी पैटर्न का हिस्सा है – जिसमें ग्रामीण, अशिक्षित और आर्थिक रूप से पिछड़े समुदायों को निशाना बनाया जाता है। यह सामाजिक असमानता का शोषण है। जब राज्य, समाज और प्रशासन इन परिवारों की रक्षा नहीं कर पाते, तो ऐसे गिरोह अपना मकड़जाल फैलाते हैं।
इस रैकेट का सबसे खतरनाक पहलू था – जातिगत दर निर्धारण। ऊंची जाति की लड़कियों के धर्मांतरण के लिए अधिक पैसा दिया जाता था। इसका मतलब है कि धर्मांतरण सिर्फ धर्म का नहीं, जाति-सामाजिक संरचना को तोड़ने का औजार भी बन चुका है। यह न केवल हिंदू समाज को कमजोर करने की चाल है, बल्कि राष्ट्र को आंतरिक रूप से विखंडित करने की भी रणनीति है।
इस मामले पर तथाकथित सेक्युलर बुद्धिजीवी वर्ग चुप है। वही वर्ग जो ‘धर्मनिरपेक्षता’ की दुहाई देता है, ‘संविधान की आत्मा’ की बात करता है, आज गूंगा बना बैठा है। क्यों? क्या धर्मांतरण को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मान लिया गया है? क्या किसी गरीब, दलित, महिला या आदिवासी का जबरन धर्म बदलवाना मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं है? अगर किसी दलित के मंदिर में प्रवेश करने से किसी को आपत्ति है, तो उस पर शोर मचता है, लेकिन जब उसी दलित को पैसों से धर्म बदलवाया जाता है तो कोई नहीं बोलता। यह मौन स्वयं एक अपराध है।
यह भी गौरतलब है कि ऐसे मामलों पर राजनीतिक दल अक्सर वोट बैंक की राजनीति के कारण खुलकर प्रतिक्रिया नहीं देते। अल्पसंख्यकों की ‘संवेदनशीलता’ के नाम पर ऐसे राष्ट्रघातक कृत्यों को नजरअंदाज किया जाता है। सवाल यह है कि क्या देश की अखंडता और सामाजिक समरसता वोट बैंक से भी छोटी हो गई है? अगर कोई हिंदू संगठन धर्मांतरण रोकने की बात करता है तो उसे कट्टरपंथी कह दिया जाता है, लेकिन जब धर्मांतरण के नाम पर विदेशी पैसा आकर समाज को तोड़ता है, तो सब चुप हो जाते हैं।
यह मामला अकेला नहीं है। देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसे गिरोह सक्रिय हैं जो सामाजिक दुर्बलता, आर्थिक मजबूरी और शिक्षा की कमी का लाभ उठाकर धर्मांतरण करा रहे हैं। इससे निपटने के लिए धर्मांतरण विरोधी कानूनों को और मजबूत बनाना चाहिए। विदेशी फंडिंग की निगरानी के लिए डिजिटल ट्रैकिंग तंत्र को सशक्त करना चाहिए। प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग की व्यवस्था होनी चाहिए। शिक्षा और रोजगार के माध्यम से समाज को आत्मनिर्भर और सजग बनाना जरूरी है।
धर्म आत्मा का विषय है, उसे सौदेबाज़ी का औजार बनाना न केवल अपराध है, बल्कि मानवता का भी अपमान है। धर्मांतरण जब व्यक्तिगत चेतना से नहीं, लालच, भय या फरेब से होता है, तो वह धर्म नहीं, शोषण होता है। हमारे लिए जरूरी है कि हम धर्मांतरण की आड़ में चल रहे इन संगठित अपराधों को पहचानें, उनका विरोध करें और समाज को ऐसी गतिविधियों से बचाने के लिए संगठित प्रयास करें। धर्म को न बेचे, न खरीदें बल्कि समझें, आत्मसात करें और उसकी गरिमा को बचाए रखें।

डॉ. सत्यवान सौरभ
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

Editor CP pandey

Recent Posts

फार्मर आईडी अब अनिवार्य: योजनाओं का लाभ लेने के लिए 15 अप्रैल तक कराएं रजिस्ट्रेशन

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। जनपद के किसानों के लिए अब फार्मर आईडी (किसान पहचान पत्र)…

36 minutes ago

संत कबीर नगर में मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन, 11.69 लाख से अधिक वोटर दर्ज

संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। Election Commission of India के निर्देशानुसार अर्हता तिथि 01…

42 minutes ago

देश के प्रमुख शहरों में खुलेगा लीगल एड सेंटर, ज्यूडिशियल काउंसिल की बड़ी पहल

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा)। देशभर में आम नागरिकों को न्याय तक आसान पहुंच उपलब्ध…

51 minutes ago

विश्व होम्योपैथी दिवस पर गोष्ठी आयोजित, डॉ सैमुअल हैनिमैन को दी श्रद्धांजलि

सलेमपुर/देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। विश्व होम्योपैथी दिवस के अवसर पर नगर के ईचौना पश्चिमी वार्ड…

57 minutes ago

बलिया में जानलेवा हमला: पूर्व चेयरमैन के बेटे पर ताबड़तोड़ वार, हालत गंभीर

बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। जनपद के बेल्थरारोड क्षेत्र में गुरुवार देर रात एक सनसनीखेज घटना…

1 hour ago

मौत का तांडव: ट्रेलर-डंपर की भीषण भिड़ंत में चालक की मौत, चौराहे पर मचा हड़कंप

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। श्यामदेंउरवा थाना क्षेत्र के परतावल मुख्य चौराहे पर शुक्रवार देर रात…

1 hour ago