कैलाश सिंह
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)।अध्यात्म कोई दिखावा नहीं, न ही केवल पूजा-पाठ या कर्मकांड का नाम है। अध्यात्म वह सूक्ष्म अनुभूति है, जिसमें मनुष्य अपने भीतर ईश्वर की उपस्थिति को महसूस करता है। जब बाहरी संसार का शोर शांत होने लगता है और अंतरात्मा की आवाज सुनाई देने लगती है, तभी अध्यात्म का वास्तविक अर्थ समझ में आता है। सच कहा जाए तो ईश्वर की अनुभूति का नाम ही अध्यात्म है।
आज का मनुष्य विज्ञान, तकनीक और भौतिक सुख-सुविधाओं के शिखर पर तो पहुंच गया है, लेकिन आंतरिक शांति उससे कोसों दूर होती जा रही है। तनाव, अवसाद, हिंसा और असंतोष की बढ़ती घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि केवल बाहरी विकास से जीवन पूर्ण नहीं होता। अध्यात्म मनुष्य को यह बोध कराता है कि सच्चा सुख बाहर नहीं, भीतर निहित है।ईश्वर किसी एक मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर या गुरुद्वारे तक सीमित नहीं है। वह करुणा में है, सेवा में है, सत्य में है और प्रेम में है। जब व्यक्ति दूसरों के दुःख में सहभागी बनता है, अन्याय के विरुद्ध खड़ा होता है और अहंकार का त्याग करता है, तभी उसे ईश्वर की अनुभूति होती है। यही अनुभूति आध्यात्म का वास्तविक स्वरूप है।
आध्यात्म व्यक्ति को आत्मसंयम, सहिष्णुता और नैतिकता की राह दिखाता है। यह मनुष्य को मैं से हम की ओर ले जाता है। आध्यात्म से उपजा विवेक न केवल व्यक्ति के जीवन को संतुलित बनाता है, बल्कि समाज में समरसता और सौहार्द की भावना को भी मजबूत करता है। बिना अध्यात्म के समाज दिशाहीन हो जाता है और मूल्यों का क्षरण होने लगता है।
भारतीय संस्कृति में ऋषि-मुनियों और संतों ने आध्यात्म को जीवन का आधार बताया है। उपनिषदों का आत्मबोध, गीता का कर्मयोग और संत परंपरा का प्रेम-मार्ग—सभी का सार यही है कि ईश्वर को पाने के लिए स्वयं को जानना आवश्यक है। जब मन निर्मल होता है और चित्त स्थिर, तभी ईश्वर की अनुभूति संभव होती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम आध्यात्म को जीवन व्यवहार में उतारें। ध्यान, योग, सेवा, सत्य और सदाचार को अपनाकर ही हम भीतर के ईश्वर से साक्षात्कार कर सकते हैं। आध्यात्म पलायन नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने की प्रक्रिया है।
अंततः कहा जा सकता है कि आध्यात्म ही वह प्रकाश है, जो मनुष्य को अंधकार से उजाले की ओर ले जाता है। ईश्वर की अनुभूति जब जीवन का आधार बन जाती है, तभी मनुष्य वास्तव में मानव बनता है।
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