राहुल गांधी की बढ़ी कानूनी मुश्किलें! गर्भवती पत्रकार को धक्का देने के आरोप पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, FIR और मुआवजे की मांग

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट परिसर में एक गर्भवती महिला पत्रकार को कथित तौर पर धक्का दिए जाने के मामले में अदालत ने मंगलवार को राहुल गांधी और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च के दौरान पत्रकार के साथ बदसलूकी हुई। आवेदक ने मामले में FIR दर्ज कराने और पीड़ित पत्रकार को मुआवजा दिलाने की मांग की है। हालांकि, इन आरोपों की अभी न्यायिक पुष्टि नहीं हुई है।

इस मामले ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। एक ओर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विपक्ष का विरोध प्रदर्शन चर्चा में है, तो दूसरी ओर उसी मार्च के दौरान कथित धक्का-मुक्की को लेकर कानूनी कार्रवाई की मांग उठी है।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

मामले का उल्लेख वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने भारत के मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ के समक्ष किया। इस पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची शामिल थे। भाटिया ने अदालत को बताया कि पहले से लंबित याचिका में एक अतिरिक्त आवेदन दाखिल किया गया है, जिसमें महिला पत्रकार के साथ कथित दुर्व्यवहार का मुद्दा उठाया गया है।

आवेदन में घटना को गंभीर बताते हुए संबंधित लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है। अदालत ने राहुल गांधी और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। यह कदम आरोपों की अंतिम पुष्टि नहीं है, बल्कि मामले में संबंधित पक्षों का पक्ष जानने की न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

आवेदन में क्या आरोप लगाए गए हैं?

याचिका के मुताबिक, 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च के दौरान महिला पत्रकार को कथित तौर पर एक गेट की दिशा में जोर से धक्का दिया गया। दावा है कि इससे उनका संतुलन बिगड़ गया और वह गिर पड़ीं। गिरते समय उन्होंने खुद को बचाने के लिए हाथों का सहारा लिया।

आवेदन में आरोप लगाया गया है कि यह घटना भीड़भाड़ वाले क्षेत्र में हुई, जहां सुरक्षाकर्मी, पत्रकार और अन्य लोग मौजूद थे। याचिकाकर्ता का दावा है कि पत्रकार ने ऐसा न करने के लिए कहा था, इसके बावजूद कथित रूप से उन्हें धक्का दिया गया। आवेदन में यह भी कहा गया है कि घटना महज भीड़ की सामान्य धक्का-मुक्की नहीं थी।

हालांकि, ये सभी आरोप याचिका में किए गए दावे हैं। अदालत की ओर से अभी इनकी सत्यता पर कोई अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है। ऐसे में मामले में संबंधित पक्षों के जवाब और आगे की न्यायिक कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी।

तीन महीने की गर्भवती होने का भी दावा

इस प्रकरण का उल्लेख इससे पहले 16 अक्टूबर को भी सुप्रीम कोर्ट में किया गया था। वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने उस समय आरोप लगाया था कि कोर्ट परिसर के अंदर महिला पत्रकार को धक्का दिया गया। उन्होंने दावा किया था कि पत्रकार तीन महीने की गर्भवती थीं और घटना के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

भाटिया ने अदालत से मामले पर संज्ञान लेने का आग्रह किया था। अब अतिरिक्त आवेदन के जरिए FIR दर्ज कराने और मुआवजे की मांग की गई है। हालांकि, पत्रकार की गर्भावस्था, अस्पताल में भर्ती होने और घटना की परिस्थितियों से जुड़े दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

SIR के विरोध में निकला था मार्च

12 अक्टूबर को राहुल गांधी और कई विपक्षी नेता अपने समर्थकों के साथ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। विपक्ष मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के दौरान कथित तौर पर बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने और अन्य अनियमितताओं का मुद्दा उठा रहा था।

इस दौरान राष्ट्रीय राजधानी में चुनावी प्रक्रिया को लेकर विरोध प्रदर्शन भी हो रहे थे। विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठाई थी। इसी राजनीतिक घटनाक्रम के बीच सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च और उससे जुड़ी याचिकाएं चर्चा में आईं।

मार्च को चुनौती देने वाली एक अन्य याचिका पर अदालत पहले ही राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, कांग्रेस पार्टी और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर चुकी है। पत्रकार से जुड़ा ताजा आवेदन इसी घटनाक्रम से संबंधित एक अलग आरोप को लेकर है।

अब आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा जवाब मांगे जाने के बाद अब संबंधित पक्षों का रुख महत्वपूर्ण होगा। याचिका में FIR दर्ज कराने और महिला पत्रकार को मुआवजा देने की मांग की गई है। इन मांगों पर आगे क्या निर्णय होगा, यह अदालत की आगामी कार्यवाही पर निर्भर करेगा।

फिलहाल, मामले में आरोपों और न्यायिक रूप से स्थापित तथ्यों के बीच अंतर करना जरूरी है। राहुल गांधी या अन्य संबंधित पक्षों की ओर से जवाब आने तथा अदालत के आगे के आदेश से इस विवाद की कानूनी दिशा अधिक स्पष्ट हो सकेगी।

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