जल में रहकर मगरमच्छ से बैर,
उन शैतानों के भी होते हैं दो पैर,
बिना किसी प्रतिबंध वे घूम रहे हैं,
छोटी बड़ी मछलियाँ निगल रहे हैं।
कोई गली मोहल्ले में तो कोई
पूरे के पूरे शहर में बना दादा है,
कोई किसी प्रांत में और कोई तो
पूरे देश में अपना हुक्म चलाता है।
लोकतंत्र में संविधान सबसे ऊपर है,
विधि विधान सारे उसी में निहित हैं,
पर विधि विधान की विस्तृत व्याख्या
सब अपने अपने ढंग से कर लेते हैं।
कोई किसी को मूर्ख समझता है,
कोई किसी को देशद्रोही कहता है,
कटुता पटुता भी सीमा से ज़्यादा है,
परशुराम जी जैसे बन गये योद्धा हैं।
कोई एक पार्टी विहीन देश चाहता है,
कोई एक दल को भगाना चाहता है,
आदित्य पक्ष विपक्ष दुश्मन बन बैठे हैं,
कोई किसी को फूटी आँख न भाता है।
•कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
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