महिला आरक्षण पर सियासी संग्राम, संसद में निर्णायक बहस

2029 चुनाव से पहले महिला आरक्षण लागू करने की तैयारी, संशोधन प्रस्ताव पर सरकार-विपक्ष आमने-सामने


नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने के उद्देश्य से 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम अब एक नए राजनीतिक मोड़ पर पहुंच गया है। सरकार इस कानून को लागू करने के लिए संशोधन प्रस्ताव लेकर आई है, ताकि 2029 के आम चुनाव से पहले महिलाओं को इसका सीधा लाभ मिल सके। इसी मुद्दे पर 16 से 18 अप्रैल तक संसद का विशेष सत्र बुलाया गया है, जहां इस पर व्यापक चर्चा होने वाली है।
दरअसल, जब 2023 में यह कानून पारित हुआ था, तब यह तय किया गया था कि महिला आरक्षण को लागू करने से पहले देश में नई जनगणना कराई जाएगी और उसके आधार पर परिसीमन (सीटों का पुनर्निर्धारण) होगा। लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण 2021 की जनगणना टल गई और अब तक इसकी प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकी है। यही वजह है कि यह कानून अब तक जमीन पर लागू नहीं हो पाया।

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अब केंद्र सरकार का तर्क है कि यदि 2029 के चुनाव तक इंतजार किया गया और तब तक जनगणना व परिसीमन पूरा नहीं हुआ, तो महिलाओं को आरक्षण का लाभ मिलने में और देरी हो जाएगी। इसलिए सरकार इस प्रक्रिया को तेज करना चाहती है और संशोधन के जरिए पहले ही आरक्षण लागू करने का रास्ता निकालने की कोशिश कर रही है।
संशोधन प्रस्ताव के तहत सरकार की योजना है कि नई जनगणना के आधार पर परिसीमन आयोग का गठन किया जाए, जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों का पुनर्निर्धारण करेगा। इसके बाद कुल सीटों में से 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी। खास बात यह है कि ये सीटें स्थायी नहीं होंगी, बल्कि हर चुनाव में बदलती रहेंगी, जिसे रोटेशन प्रणाली कहा जाता है।
हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक माहौल गरम हो गया है। विपक्षी दल सरकार के इरादों पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि बिना जनगणना और परिसीमन के आधार तैयार किए महिला आरक्षण लागू करना जल्दबाजी होगी और इससे क्षेत्रीय असंतुलन पैदा हो सकता है। खासकर दक्षिण भारत के राज्यों ने इस पर कड़ा एतराज जताया है।
विपक्ष का मुख्य तर्क यह है कि यदि जनसंख्या को परिसीमन का आधार बनाया गया, तो उत्तर भारत के राज्यों—जहां जनसंख्या अधिक है—को ज्यादा सीटें मिलेंगी, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों की सीटें घट सकती हैं। इन राज्यों का कहना है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, तो उन्हें इसका “दंड” क्यों मिले। इसके अलावा, कुछ दलों ने यह भी मांग उठाई है कि महिला आरक्षण के भीतर ओबीसी महिलाओं के लिए अलग कोटा तय किया जाए।

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दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि उसका उद्देश्य केवल महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बराबरी दिलाना है। सरकार यह भी स्पष्ट कर चुकी है कि किसी भी राज्य की सीटें कम नहीं की जाएंगी, बल्कि जरूरत पड़ने पर कुल सीटों की संख्या बढ़ाई जा सकती है। इससे सभी राज्यों को संतुलित प्रतिनिधित्व मिलेगा और महिलाओं को भी उनका अधिकार मिल सकेगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा केवल महिला सशक्तिकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे जनगणना, परिसीमन और क्षेत्रीय राजनीति का जटिल समीकरण भी जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि संसद का यह विशेष सत्र बेहद अहम माना जा रहा है। इसमें लिए गए फैसले आने वाले चुनावों और देश की राजनीतिक दिशा दोनों को प्रभावित कर सकते हैं।
अब सबकी नजरें संसद में होने वाली बहस पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि महिलाओं को 33% आरक्षण कब और किस रूप में मिलेगा। अगर सहमति बनती है, तो यह भारतीय लोकतंत्र में एक ऐतिहासिक कदम साबित हो सकता है।

Editor CP pandey

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