14 नवंबर 1962: जब संसद ने चीन से हर इंच भूमि वापस लाने की प्रतिज्ञा ली

नवनीत मिश्र

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में कुछ तिथियाँ केवल घटनाओं की याद नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान और एकता के प्रतीक के रूप में दर्ज होती हैं। 14 नवंबर 1962 ऐसी ही तारीख है, जब चीन के विस्तारवादी आक्रमण के बीच भारतीय संसद ने एक सुर में वह संकल्प लिया, जिसने पूरी दुनिया को भारत की दृढ़ इच्छाशक्ति का संदेश दिया। यह वह दिन था, जिसने साबित किया कि संकट कितना ही बड़ा हो, भारत अपनी जमीन और सम्मान की रक्षा के लिए एकजुट होकर खड़ा होता है।
1950 के दशक में तिब्बत पर कब्जा जमा लेने के बाद चीन की निगाहें भारतीय सीमाओं पर थीं। पंचशील समझौते और शांति की बातों के बीच चीनी सेना धीरे–धीरे लद्दाख और उत्तर–पूर्व के इलाकों में घुसपैठ बढ़ाती रही। अंततः अक्टूबर 1962 में चीन ने अचानक हमला कर दिया। प्रयाप्त तैयारी न होने के बावजूद भारतीय जवानों ने अदम्य साहस दिखाया, लेकिन चीन ने हजारों वर्ग मील क्षेत्र पर कब्जा कर लिया।
स्थिति जितनी गंभीर थी, उतना ही देश का मनोबल टूटने की कगार पर था। ऐसे समय में राष्ट्र को दिशा देने की जिम्मेदारी संसद पर थी।
इसी संकट की घड़ी में 14 नवंबर 1962 को भारतीय संसद का संयुक्त सत्र बुलाया गया। वातावरण भारी थाl चिंता, पीड़ा और आक्रोश सब एक साथ मौजूद थे। उसी दिन सर्वसम्मति से एक ऐसा प्रस्ताव पारित किया गया, जिसे आज भी राष्ट्रीय संकल्प की मिसाल माना जाता है।
प्रस्ताव में कहा गया कि “भारत की संसद प्रतिज्ञा करती है कि चीन ने भारत की जिस एक–एक इंच भूमि पर कब्जा किया है, उसे वापस लिए बिना चैन से नहीं बैठेंगे।”
यह केवल शब्दों का संग्रह नहीं था, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र की भावना थी, जो अपने सम्मान और अखंडता को सर्वोपरि मानता है। इस प्रस्ताव में न किसी दल का मतभेद था, न किसी विचारधारा की दूरी, सिर्फ भारत की आवाज थी।
इस प्रस्ताव का महत्व इसलिए भी अधिक था क्योंकि यह राजनीतिक विभाजन से ऊपर उठकर लिया गया निर्णय था। युद्धकाल की कठिन परिस्थितियों में संसद का ऐसा सामूहिक संकल्प सेना के मनोबल को मजबूती देने वाला साबित हुआ। यह स्पष्ट संदेश था कि भारत किसी भी परिस्थिति में अपनी जमीन के साथ समझौता नहीं करेगा।
1962 के युद्ध की पीड़ा गहरी थी, लेकिन उसने भारत को अपनी रक्षा नीति पर नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर किया। सेना के आधुनिकीकरण, सीमा प्रबंधन, नए रक्षा ढांचे और कूटनीतिक रणनीतियों को मजबूत करने की प्रक्रिया तेज हुई। राष्ट्र ने यह समझ लिया कि सुरक्षा और तैयारी किसी भी शांति–नीति का अनिवार्य हिस्सा हैं।
आज भी प्रासंगिक है 14 नवंबर का संदेश दशक बीत गए, लेकिन 14 नवंबर 1962 का प्रस्ताव आज भी राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा है। यह हमें याद दिलाता है कि भारत शांतिप्रिय जरूर है, पर अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए सदैव तत्पर और दृढ़ है।
वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में जब सुरक्षा चुनौतियाँ लगातार बदल रही हैं, यह संकल्प और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
14 नवंबर 1962 का संसदीय संकल्प भारत की लोकतांत्रिक ताकत, राष्ट्रीय एकता और आत्मसम्मान का प्रतीक है। संसद ने उस दिन जो प्रतिज्ञा ली थी, वह सिर्फ तत्कालीन युद्धकाल के लिए नहीं, बल्कि भारत की आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन गई।
यह संकल्प आज भी हमें यही संदेश देता है कि राष्ट्र की भूमि और सम्मान से बड़ा कुछ नहीं, और भारत इसके लिए हर परिस्थिति में एकजुट खड़ा रहेगा।

rkpNavneet Mishra

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