पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। बिहार में चुनावी शंखनाद बस होने ही वाला है, और इसी के साथ राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो चुकी है। सभी प्रमुख राजनीतिक दल चुनावी मोड में आ चुके हैं, वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की गतिविधियां भी अचानक तेज हो गई हैं। लंबे समय से सियासी रूप से शांत नजर आ रहे नीतीश कुमार ने अब एक के बाद एक बड़े फैसले लेकर सुर्खियों में वापसी कर ली है। हाल ही में नीतीश सरकार ने राज्य के आशा और ममता कर्मियों के लिए वेतन वृद्धि की घोषणा की थी, और अब उन्होंने सरकारी स्कूलों में कार्यरत रसोइयों, रात्रि प्रहरियों तथा शारीरिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य अनुदेशकों के मानदेय को दोगुना करने का ऐलान किया है। यह निर्णय न केवल चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है, बल्कि लाखों परिवारों को राहत भी पहुंचा सकता है। क्या है नया फैसला? सरकारी स्कूलों में मध्याह्न भोजन योजना (Mid Day Meal) के तहत कार्यरत रसोइयों का मासिक मानदेय दोगुना किया गया है। रात्रि प्रहरियों, जो विद्यालयों की सुरक्षा व्यवस्था में सहयोग करते हैं, उनके वेतन में भी समान वृद्धि की गई है। शारीरिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य अनुदेशकों को भी अब पहले से दोगुनी राशि मिलेगी, जिससे उन्हें आर्थिक रूप से मजबूती मिलेगी। चुनाव से ठीक पहले क्यों बढ़ाए वेतन? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला पूरी तरह से चुनावी रणनीति का हिस्सा है। ग्रामीण इलाकों में इन कर्मचारियों का प्रभाव व्यापक होता है, और इन्हें साधकर नीतीश कुमार अपने पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करना चाहते हैं। एक ओर जहां विपक्ष इन कदमों को “चुनावी लॉलीपॉप” बता रहा है, वहीं सरकार इसे “जनकल्याणकारी निर्णय” करार दे रही है। विपक्ष ने साधा निशाना राजद, कांग्रेस और वाम दलों सहित कई विपक्षी नेताओं ने नीतीश कुमार पर निशाना साधते हुए कहा कि “जनता सब समझ रही है। नीतीश जी को 5 साल बाद इन कर्मचारियों की याद चुनाव के वक्त ही क्यों आई?” वहीं जदयू नेताओं का कहना है कि यह फैसला किसी राजनीति से प्रेरित नहीं है, बल्कि सरकार की संवेदनशीलता और कर्मचारियों के हित में उठाया गया एक जरूरी कदम है।
बिहार में जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, सरकार द्वारा किए जा रहे सामाजिक और आर्थिक फैसलों में तेजी देखी जा रही है। नीतीश कुमार का यह वेतन वृद्धि वाला कदम न केवल राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है, बल्कि इससे लाखों कर्मचारियों को सीधा लाभ भी मिलेगा। अब देखना यह होगा कि जनता इसे जनहित का फैसला मानती है या चुनावी फायदा उठाने की कोशिश।
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