वेद, पुराण, उपनिषद सारे,
ब्रह्माण्ड का ज्ञान बखान रहे,
किंचित नेति नेति के प्रतिफल,
चरैवेति चरैवेति स्वीकार रहे।
धर्म से अर्थ का अर्जन कर,
काम कामना जीवन की,
धर्म, अर्थ व काम के पथ से,
मोक्ष की महिमा जान रहे।
नेति नेति का पाठ पढ़ाकर,
सबने यही सिखाया है,
ज्ञान की इत्ति नहीं होती है,
जीवन सिद्धांत दिखाया है।
चरैवेति चरैवेति आकांक्षा है,
और बहुत कुछ बाक़ी है,
मोक्ष से ऊपर मोक्ष की महिमा,
सदा समय ने आंकी है ।
एकोहम् द्वितीयोनास्ति,
गीतोपदेश का दर्शन है,
हर युग में, प्रभु के दसोवतार में,
ब्रह्म ज्ञान का वर्णन है।
ब्रह्म सत्य है, सत्य ब्रह्म है,
मोक्ष काम है, काम मोक्ष है,
धर्म ब्रह्म है, ब्रह्म धर्म है,
धर्म सत्य है, सत्य धर्म है ।
ज्ञान धर्म है, ज्ञान अर्थ है,
ज्ञान कर्म (काम) है, कर्म ज्ञान है।
धर्म, अर्थ व काम सत्य है,
सत्य धर्म में मोक्ष ज्ञान है।
नेति नेति है, नेति नियति है, नियति नेति है, चरैवेति है, चरैवेति है,
नेति नियम है, नेति नीति है,
आदित्य नियति सत्य है,
सत्य चरैवेति है, चरैवेति है।
•कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
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