सरलमानकसंस्कृतम् विषयक राष्ट्रीय कार्यशाला दुनिया का एकमात्र पवित्र और विशुद्ध भाषा है संस्कृत– प्रोफेसर कृष्ण मोहन

संस्कृत के अंदर ज्ञान,विज्ञान, ज्योतिष, आयुर्वेद, योग और वास्तु कला भी समाहित

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)।दुनिया में एकमात्र पवित्र और विशुद्ध भाषा संस्कृत है यह भाषा अपनी पीढ़ियों को निरंतर गौरव का बोध कर रहा है। संस्कृत का व्याकरण दुनिया का सबसे व्यापक व्याकरण है इसमें 102 करोड़ शब्द है इसको सरल और सहज बनाने का कार्य संस्कृत भारती से जुड़े लोग कर रहे हैं।
उक्त विचार जवाहरलाल नेहरू पीजी कालेज में संस्कृत विभाग की ओर से आयोजित सरलमानकसंस्कृतम् विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए जेएनयू नई दिल्ली के संस्कृत के आचार्य प्रोफेसर कृष्ण मोहन पाण्डेय ने व्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि अपनी पहचान बनाने के लिए अनेक भाषाओं का प्रचलन हुआ परंतु दसवीं शताब्दी के पूर्व केवल देव भाषा के रूप में संस्कृत ही विराजमान था। उन्होंने कहा कि संस्कृत के अंदर ज्ञान,विज्ञान ,ज्योतिष, आयुर्वेद ,योग और वास्तु शास्त्र सभी विद्यमान है इसलिए संस्कृत की सहजता और सरलता को समझना होगा।
विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय नई दिल्ली के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ धनंजय मणि त्रिपाठी ने कहा कि विश्व में संस्कृत एकमात्र ऐसी भाषा है जिसमें शास्त्रीयता,परिष्कृतता, प्राचीनता और निरंतरता की अप्रतिम और अविछिन्न परंपरा है। उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा उतनी ही प्राचीन है जितनी की सृष्टि, क्योंकि सृष्टि के समय सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के मुख से ही संस्कृत का आविर्भाव हुआ था ।
विशिष्ट के रूप में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी के सहायक आचार्य डॉ शैलेंद्र कुमार साहू ने कहा कि संस्कृत से ही हमारी संस्कृति का विस्तृत रूप दिखाई देता है विश्व के लिए आदर्श बहुत ही संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाने के लिए संस्कृत के मानकों का सरलीकरण आदि अत्यंत आवश्यक तो है ही समाज के लिए हमारा कर्तव्य एवं धर्म भी है। कोई भी भाषा दो रुप में हमारे सामने आती है ।
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग की सहायक आचार्य डॉ लक्ष्मी मिश्रा ने कहा कि भारत की सात भाषाओं में से प्रत्येक भाषा के लिए एक-एक भाषा विश्वविद्यालय की स्थापना है यह सभी विश्वविद्यालय संस्कृत के उत्थान और विकास के लिए सतत प्रयत्नशील है। संस्कृत भाषा शब्द निर्माण शक्ति विश्व में अद्वितीय है l
सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग की प्रभारी डॉ आभा द्विवेदी ने कहा कि छोटे-छोटे प्रयासों के माध्यम से युवा पीढ़ी को संस्कृत भाषा से व्यवहार में जोड़ना है l संस्कृत भाषा सभी के लिए है और सभी को संस्कृत भाषा से जोड़ना होगा l
अध्यक्षता करते हुए प्रबंधक डॉ बलराम भट्ट ने कहा कि अत्यंत मेघवन व्यक्ति ही संस्कृत भाषा को समझ पाता है इन्हें इस तरह के कार्यशालाओं से जोड़कर और सरल तथा सहज बनाना होगा।
कार्यशाला के प्रारंभ में प्राचार्य डॉ अजय कुमार मिश्रा ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए संस्कृत भाषा की महत्ता को रेखांकित किया और कहा कि संस्कृत भाषा और साहित्य ने सर्वदा समावेशी विचारों को बढ़ावा दिया है संस्कृत भारतवर्ष की सर्व समावेशी संस्कृत के लिए मुख्य रूप से कारण भूत हैl
सदर विधायक जयमंगल कनौजिया ने भी राष्ट्रीय कार्यशाला को संबोधित किया और संस्कृत की प्राचीनता को उद्घाटित किया l
सभी अतिथियों को अंग वस्त्र और प्रतीक चिन्ह देकर प्राचार्य डॉ अजय कुमार मिश्रा, डॉ नंदिता मिश्रा, डॉ नेहा, डॉ विपिन यादव, डॉ धर्मेंद्र सोनकर की ओर से सम्मानित किया गया। कार्यशाला के प्रारंभ में विषय परिवर्तन संस्कृत के सहायक आचार्य डॉ मृत्युंजय कुमार तिवारी ने किया। संचालन कार्यशाला के संयोजक सहायक आचार्य डॉ राजू शर्मा ने किया जबकि सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापन आयोजन सचिव डॉ नंदिता मिश्रा ने किया।

Editor CP pandey

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