मटमैला पानी: विकास के दावों पर भारी पड़ती जमीनी हकीकत

देश के स्वच्छता सर्वेक्षणों में लगातार अव्वल रहने वाला इंदौर आज एक ऐसे गंभीर सवाल के घेरे में है, जो सीधे आम नागरिकों के जीवन से जुड़ा हुआ है—क्या शहर में सुरक्षित और स्वच्छ पेयजल उपलब्ध है?

भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी पीने से हुई मौतों ने न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को झकझोर दिया है, बल्कि तथाकथित “विकास मॉडल” की वास्तविकता को भी उजागर कर दिया है। यह घटना बताती है कि चमकदार आंकड़ों और पुरस्कारों के पीछे छिपी जमीनी सच्चाई कितनी भयावह हो सकती है।

शहर में विकास की रफ्तार भले ही तेज दिखाई देती हो, लेकिन नगर निगम द्वारा आपूर्ति किया जा रहा पेयजल आज भी बुनियादी गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतर पा रहा है। कई इलाकों में नालियों के किनारे से गुजरती जर्जर पाइपलाइनें, वर्षों से साफ न हुई जल टंकियां, और बार-बार होने वाली लीकेज—ये सभी कारण मिलकर उस मटमैले और जहरीले पानी को जन्म देते हैं, जो धीरे-धीरे नागरिकों की सेहत और अब उनकी जान पर भारी पड़ रहा है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि हर बड़ी घटना के बाद ही प्रशासन हरकत में आता है। आनन-फानन में टंकियों की सफाई, लीकेज सुधारने के अस्थायी निर्देश और जांच समितियों का गठन—ये सब स्थायी समाधान नहीं, बल्कि संकट के बाद निभाई जाने वाली औपचारिकताएं बनकर रह जाती हैं। सवाल यह है कि क्या नागरिकों की जान जाना ही सिस्टम को जगाने की शर्त है?

इस पूरे घटनाक्रम में राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। वर्षों से जनप्रतिनिधि सिस्टम पर निर्भर रहकर अपनी जिम्मेदारी से बचते रहे हैं। निगरानी के अभाव और जवाबदेही की कमी ने लापरवाही को बढ़ावा दिया, जिसका सीधा खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।

पेयजल जैसी मूलभूत सुविधा में यदि नाली का पानी मिल जाए, तो यह केवल तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता का स्पष्ट प्रमाण है। स्वच्छ जल कोई अनुग्रह नहीं, बल्कि हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। ऐसे में आवश्यकता किसी दिखावटी व्यवस्था की नहीं, बल्कि ईमानदार, पारदर्शी और नियमित निगरानी तंत्र की है।

समय की मांग है कि—

• पुरानी पाइपलाइनों को चरणबद्ध तरीके से बदला जाए

• जल टंकियों की नियमित और प्रमाणित सफाई सुनिश्चित हो

• जल गुणवत्ता की सार्वजनिक रिपोर्टिंग की जाए

• सबसे महत्वपूर्ण, जिम्मेदार अधिकारियों व ठेकेदारों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय हो

अब ज़रूरत है कि जनप्रतिनिधि केवल फाइलों और मंचों तक सीमित न रहें, बल्कि ज़मीन पर उतरकर हालात देखें। क्योंकि जब पानी ही ज़हरीला हो जाए, तो विकास के सारे दावे फीके पड़ जाते हैं।
भागीरथपुरा की पहचान किसी त्रासदी से नहीं, बल्कि एक चेतावनी के रूप में होनी चाहिए—कि अब और लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं है।


संजय एम. तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इंदौर, मध्य प्रदेश

Karan Pandey

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