भक्तों की मुरादें पूरी करती है मां बनैलिया देवी (वन देवी)

अज्ञातवास के दौरान राजा विराट के भवन से लौटते समय पांडवों ने मां वन शक्ति की यहां आराधना किए थे

विदेश से श्रद्धालु आते हैं मां बनैलिया का दर्शन करने

मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु बनवाते हैं हाथी की मूर्ति

डॉ सतीश पाण्डेय व नीरज मिश्र की रिपोर्ट

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। पूर्वी उत्तर प्रदेश के नेपाल सीमा को जोड़ने वाले नगर नौतनवा में वन देवी अर्थात मां बनैलिया के नाम से विख्यात मंदिर स्थित है। मंदिर के इतिहास के सम्बंध में बताया जाता है कि अज्ञातवास के दौरान राजा विराट के भवन से लौटते समय पाण्डवों ने मां वन शक्ति की यहां पर अराधना किये थे जिससे प्रसन्न होकर मां ने पिण्डी स्वरूप में पाण्डवों को दर्शन दिया। कालांतर में मां की पिण्डी खेतों के बीच समाहित हो गई। एक दिन खेत में काम कर रहे किसान केदार मिश्र को स्वप्न में मां ने कहा कि यहां पर मेरी पिंडी खोजकर मेरे मंदिर का निर्माण करो। इसके बाद केदार मिश्र ने सन 1888 में यहां पर एक छोटे से मंदिर का निर्माण कराया जो आज विशालकाय मंदिर के रूप में स्थापित हो चुका है। जिसकी स्थापना 20 जनवरी 1991 को विधि पूर्वक हुई। प्रतिवर्ष इस दिन को वार्षिकोत्सव के रूप में बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। यहां पर आने वाले हर भक्त की इच्छा मां पूरा करती है। चूंकि मां को हाथी बहुत पसंद है, इसलिए इच्छा पूरी होने पर श्रद्धालु यहां पर हाथी की मूर्ति चढ़ाते हैं। मन्दिर की बनावट वृताकार अरघा नुमा संरचना है, जिसके अंदर मां के नौ स्वरूपों को स्थापित किया गया है। केन्द्र में मां बनैलिया की भव्य प्रतिमा शोभायमान है। मंदिर वर्ताकार होने के कारण मां का परिक्रमा मंदिर के अंदर ही किया जाता है।मंदिर तक पहुंचने के लिए रेल एवं सड़क दोनो मार्गों से साधन उपलब्ध है। गोरखपुर से चलकर नौतनवा आने पर रिक्शा एवं आटो की मदद से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित मंदिर पर आसानी से पहुंचा जा सकता है। यहां पर देश के कोने-कोने एवं नेपाल से भी भारी संख्या में श्रद्धालु आते रहते हैं। मंदिर परिसर में तीर्थ यात्रियों के रात्रि निवास की व्यवस्था भी की जाती है।मंदिर के पुजारियों के बारे में बताया जाता है । वर्ष 1938 में पुजारी रामप्यारे दास आए और 1946 तक पुजारी रहे। दूसरे पुजारी रामप्रीत दास 1946 से 1959 तक रहे। तीसरे पुजारी कमलनाथ 1959 से 1973 तक रहे। चौथे पुजारी महातम यादव 1973 से 1996 तक रहे। उसके बाद पुजारी काशी दास 1996 में आए और 9 वर्ष तक रहे। इन्हीं के देख-रेख में पुराने मंदिर के जगह नए मंदिर व नई प्रतिमा का निर्माण हुआ।हर वर्ष 20 जनवरी को मंदिर का स्थापना दिवस बड़े ही धूमधाम के साथ वार्षिकोत्सव के रूप में मनाया जाता हैं।अब तक 29 वां वार्षिक उत्सव मनाया जा चुका है। वार्षिकोत् दौरान समाज के हर वर्ग के लोगों का सहयोग मिलता है। मंदिर परिसर से भव्य शोभा यात्रा निकली है।राष्ट्र की परम्परा टीम से श्रद्धालु नौतनवा नगर पालिका उसमान नगर वार्ड निवासी अनिल तिवारी ने बताया कि वन शक्ति पर विश्वास रखने से मेरा पूरा परिवार सुख, समृद्धि से पूर्ण है। मां बनैलिया मंदिर की स्थापना जब से हुई तब से लेकर आज तक उन पर हमारी पूरी श्रद्धा है। उनके दर्शन मात्र से ही मन में शान्ति मिलती है।
बृजमनगंज निवासी अखिलेश मिश्रा ने कहा कि माता के चमत्कार का गुणगान चारो तरफ है खासकर नेपाल के लोग यहां रोजाना दर्शन करने के लिए आते जाते है तथा मनोकामना पूर्ण होने पर कीर्तन , रामायण पाठ सहित कई धार्मिक अनुष्ठान का कार्यक्रम करते है।

rkpnews@desk

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