राजस्व और जन सुरक्षा दोनों पर गहरा रहा है संकट
भागलपुर/देवरिया(राष्ट्र की परम्परा)
सरयू नदी के किनारों पर चल रहा खनन अब केवल पर्यावरण या स्थानीय समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह एक गहरी प्रशासनिक विफलता और संभावित मिलीभगत का संकेत देता है। एक ओर बाढ़ से बचाव के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर नदी किनारे पत्थर डाले जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर रात के अंधेरे में अवैध खनन उसी सुरक्षा व्यवस्था को खोखला कर रहा है। जबकि आम जनता के इन अमूल्य धरोहर को
बेख़ौफ़ माफियाओं द्वारा चंद रुपयों के लिए मिटाया जा रहा है और प्रशासन मूक दर्शक बना हुआ है।
यह विरोधाभास कई गंभीर सवाल खड़े करता है—क्या प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं है, या फिर सब कुछ जानते हुए भी अनदेखी की जा रही है?
राजस्व का खुला नुकसान
अवैध खनन सीधे-सीधे सरकार के राजस्व पर चोट है। बिना अनुमति मिट्टी और बालू का दोहन कर खनन माफिया लाखों-करोड़ों का मुनाफा कमा रहे हैं, जबकि सरकार को मिलने वाला टैक्स और रॉयल्टी शून्य हो जाती है। यह न केवल आर्थिक अपराध है, बल्कि देश के संसाधनों की खुली लूट भी है।
सुरक्षा कार्यों पर पानी फेरता खनन
भागलपुर क्षेत्र में बाढ़ और कटान से बचाव के लिए वर्षों से करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं—स्पर, बोल्डर पिचिंग, और कटाव रोधी कार्य। लेकिन अवैध खनन इन सभी प्रयासों को निष्प्रभावी बना देता है। नदी की धारा बदलती है, किनारे कमजोर होते हैं और बस्तियां पुनः खतरे में आ जाती हैं।
मिलीभगत के संकेत
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि खनन माफिया बिना प्रशासनिक संरक्षण के इतने बड़े पैमाने पर काम नहीं कर सकते। रात में मशीनों की आवाज, ट्रैक्टर-ट्रॉली की आवाजाही और पुल के पास गतिविधियां—ये सब बिना किसी रोक-टोक के चल रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या जिम्मेदार अधिकारी जानबूझकर आंखें मूंदे हुए हैं?
पर्यावरण और भविष्य पर खतरा
नदी का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने से
जलस्तर, जैव विविधता और आसपास के खेतों पर भी असर पड़ता है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले समय में यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है
क्या होना चाहिए समाधान?
अवैध खनन पर तत्काल और सख्त कार्रवाई
जिम्मेदार अधिकारियों की जांच और जवाबदेही तय करना
रात में गश्त और निगरानी के लिए विशेष टीमों का गठन
स्थानीय लोगों की शिकायतों को गंभीरता से लेना
सरयू किनारे हो रहा अवैध खनन
केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि देश के संसाधनों और जनता की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। जब तक प्रशासनिक तंत्र ईमानदारी से कार्रवाई नहीं करेगा, तब तक “विकास” के नाम पर हो रहा यह खेल यूं ही चलता रहेगा। अब समय है कि इस गठजोड़ को तोड़ा जाए और व्यवस्था को पारदर्शी बनाया जाए।
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