मालेगांव ब्लास्ट केस: सबूत नहीं जुटा पाने पर कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी किया

नई दिल्ली/मुम्बई,(राष्ट्र की परम्परा डेस्क)।
मालेगांव 2008 बम विस्फोट मामले में आज विशेष एनआईए अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में विफल रहा और आरोपियों को “संदेह का लाभ” दिया गया। फैसले के बाद न्यायिक प्रक्रिया और जांच एजेंसियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
इस केस में प्रमुख आरोपियों में वर्तमान सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, सेना अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित, स्वामी असीमानंद, सुनील जोशी (अब मृत), रमेश उपाध्याय, अजय राहिरकर, सुधाकर द्विवेदी आदि शामिल थे। लगभग 17 वर्षों तक चले इस मामले में न्यायालय ने कहा कि आरडीएक्स पुरोहित के घर से मिला, यह अभियोजन साबित नहीं कर सका।
फरीदाबाद में साजिश रची गई, इसका कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिला। बम किसने प्लांट किया, यह भी अभियोजन नहीं बता पाया।
धमाके के लिए किसी प्रकार का लेन-देन हुआ, इसका कोई ठोस साक्ष्य अदालत के सामने नहीं आया।

भोपाल में साजिश रचने का कोई गवाह नहीं मिला।प्रज्ञा ठाकुर की मोटरसाइकिल पर बम रखा गया, यह भी साबित नहीं हुआ।फरीदाबाद में शादी में उपस्थित रहना भी संदेह दूर नहीं कर सका।
“सबूतों में मिलावट”, “जबरदस्ती के बयान”: अदालत ने जताई चिंताविशेष अदालत ने यह भी कहा कि कई सबूतों की प्रमाणिकता पर प्रश्नचिन्ह लगे हैं। कुछ गवाहों ने कोर्ट में बयान से पलटी मारी, वहीं कुछ ने आरोप लगाया कि उनसे जबरन बयान लिए गए। अभियोजन पक्ष की जांच में कई खामियां उजागर हुईं, जिससे केस कमजोर होता गया।

🔹 चाचा का बयान भी साक्ष्य नहीं बन सका मामले में प्रज्ञा ठाकुर के चाचा द्वारा दिया गया बयान भी निर्णायक नहीं बन पाया। अदालत ने उसे “स्वजन का भावनात्मक और अनौपचारिक वक्तव्य” करार देते हुए खारिज कर दिया।

🔹 राजनीतिक संदर्भ भी उभरे, पर कोर्ट ने माना ‘सेशन वैलिड नहीं’ वर्ष 2011 में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान मालेगांव केस में कार्रवाई तेज हुई थी। इस दौरान “हिंदू आतंकवाद” शब्दावली भी सुर्खियों में आई। लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजनीतिक हलचल या सरकारों के बदलने का इस केस की कानूनी वैधता से कोई संबंध नहीं।
महाराष्ट्र के मालेगांव में 29 सितंबर 2008 को बम धमाका हुआ था जिसमें 6 लोगों की मृत्यु हो गई और दर्जनों घायल हुए थे। यह केस पहले महाराष्ट्र ATS के पास था और 2011 में इसे एनआईए को सौंपा गया था।
17 साल की लंबी न्यायिक प्रक्रिया और राजनीतिक-सामाजिक बहसों के बाद आज विशेष अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट के अनुसार, “संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।”
अब यह देखना बाकी है कि क्या एनआईए या राज्य सरकार इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देती है या नहीं।

Editor CP pandey

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