“दो बार बिकी ज़िंदगी”: पूर्णिया की विभा देवी की कहानी समाज की चुप्पी पर करारा तमाचा

पूर्णिया की 27 वर्षीय विभा देवी की ज़िंदगी उस भयावह त्रासदी की मिसाल है, जहां गरीबी, बेबसी और अपनों का धोखा एक बेटी को दो बार बेचा जाना पड़ता है। यह सिर्फ एक महिला की नहीं, बल्कि पूरे समाज की असंवेदनशीलता और खामोशी की कहानी है।

पूर्णिया (राष्ट्र की परम्परा डेस्क की रिपोर्ट)
विभा देवी की आंखों में अब आंसू नहीं, बस एक सूनापन है। ज़िंदगी ने उससे इतना कुछ छीन लिया है कि अब शिकायत की भी कोई उम्मीद नहीं बची। 27 साल की उम्र में वह अपने दो छोटे बच्चों को लेकर पूर्णिया की गलियों में दर-दर भटक रही है—न छत है, न खाना, न कोई सहारा।

लेकिन विभा की कहानी की शुरुआत उस वक्त होती है, जब वह सिर्फ 13 साल की थी। उसके पिता झबरू राम की मौत के बाद बड़ी मां उसे अररिया जिले के भरगामा थाना क्षेत्र स्थित हरिपुर काला गांव से यह कहकर पूर्णिया ले गई कि वह उसकी अच्छी परवरिश करेगी। पर 7 साल बाद उसी बड़ी मां ने उसके साथ ऐसा विश्वासघात किया, जिसे सुनकर किसी की भी आत्मा कांप उठेगी।

पहली बार दो लाख में बिकी मासूमियत

वर्ष 2011, जब विभा किशोरी थी, तब बड़ी मां ने उसे उत्तर प्रदेश के मथुरा निवासी सुरेश राम के हाथ दो लाख रुपए में बेच दिया। सुरेश पहले से शादीशुदा था। यह बात विभा को बाद में पता चली, जब उसने नशे की हालत में खुद कहा कि उसने पैसे देकर उसका सौदा किया है।

घरेलू हिंसा और नवजात की हत्या

विभा ने मजदूरी कर किसी तरह ज़िंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश की, लेकिन वर्ष 2018 में उसकी दूसरी बेटी के जन्म के बाद सुरेश ने उस मासूम की कथित तौर पर गला घोंटकर हत्या कर दी। विभा की दुनिया एक बार फिर उजड़ गई।

दोबारा बेची गई एक लाख में

पहले पति के भाग जाने के बाद विभा अपनी बेटी को लेकर फिर पूर्णिया लौट आई, उम्मीद थी कि बड़ी मां उसे अब स्वीकार करेगी। लेकिन दूसरी बार, उसी बड़ी मां ने विभा को और उसकी बेटी को एक लाख रुपए में फिर से बेच दिया।इस बार की शादी से एक बेटा हुआ, लेकिन कुछ ही वर्षों में दूसरे पति ने भी उसे छोड़ दिया।

आज का यथार्थ: न घर, न सहारा आज विभा देवी अपने दोनों बच्चों के साथ न घर की है, न घाट की। वो रोज़ रोटी के लिए भटकती है, सिर छुपाने को कोई कोना नहीं। सरकार, समाज और सिस्टम – सब चुप हैं।
समाज पर सवाल विभा देवी की कहानी महज एक महिला की पीड़ा नहीं, बल्कि हमारे समाज की उस घातक चुप्पी और नैतिक गिरावट का आईना है, जहां बेटियों को बोझ समझकर उनके साथ सौदा किया जाता है। जिस घर में उन्हें प्यार, सुरक्षा और सहारा मिलना चाहिए, वहीं उन्हें दौलत में तौला जाता है।
क्या कोई उम्मीद है?
विभा देवी की स्थिति यह मांग करती है कि प्रशासन, समाजसेवी संगठन और महिला कल्याण विभाग तुरंत संज्ञान लें। ज़रूरत है कि उसे और उसके बच्चों को न केवल रहने और खाने की व्यवस्था मिले, बल्कि मानसिक व सामाजिक पुनर्वास का भी पूरा मौका दिया जाए।विभा की ज़िंदगी की ये सच्चाई सिर्फ एक रिपोर्ट नहीं, एक पुकार है – समाज से, सिस्टम से और हम सबसे। क्या हम अब भी चुप रहेंगे?

Editor CP pandey

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