मध्य प्रदेश (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। मध्य प्रदेश से न्यायिक विलंब का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने न्याय व्यवस्था की धीमी गति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य परिवहन निगम में कार्यालय बिल सहायक रहे जागेश्वर अवधिया पर लगभग चार दशक पहले मात्र ₹100 की रिश्वत लेने का आरोप लगाया गया था।
उस समय दर्ज किए गए इस झूठे मामले ने अवधिया की पूरी ज़िंदगी को तहस-नहस कर दिया। आरोप साबित करने में 39 साल लग गए और अब जब अदालत ने उन्हें बेगुनाह करार दिया है, तब उनकी उम्र 83 वर्ष हो चुकी है।
इस लंबे अंतराल में जागेश्वर अवधिया का करियर बर्बाद हो गया, सामाजिक सम्मान टूट गया और उनकी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा अदालतों के चक्कर काटने में ही गुजर गया।
यह मामला एक बड़ा प्रश्न खड़ा करता है कि जब महज़ ₹100 के आरोप में सच्चाई सामने आने में लगभग चार दशक लग सकते हैं, तो हमारी न्याय व्यवस्था आम नागरिक को समय पर न्याय दिलाने में कितनी सक्षम है?
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