महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। तेज रफ्तार, तकनीक और दिखावे से भरे इस दौर में अक्सर कहा जाता है कि मानवता मर चुकी है। लोग अपने स्वार्थ तक सिमट गए हैं और संवेदनाएं धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे अलग है। मानवता आज भी जीवित है, बस उसकी पीड़ा सुनने और उसका हाथ थामने वाला कोई चाहिए।
हर गांव, हर मोहल्ले और हर शहर में ऐसे लोग मौजूद हैं जो चुपचाप संघर्ष कर रहे हैं। कोई सरकारी योजनाओं से वंचित है, तो कोई इलाज और भोजन के अभाव में टूट रहा है। ये लोग नारे नहीं लगाते, न ही सुर्खियां बनते हैं। वे सिर्फ इंतजार करते हैं कि कोई उनकी बात सुने, कोई उनकी तकलीफ समझे।
सरकारी योजनाएं और नीतियां कागजों पर प्रभावशाली दिखती हैं, लेकिन जब तक उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंचता, तब तक विकास अधूरा रहता है। असली समस्या संसाधनों की नहीं, बल्कि संवेदनशीलता की कमी की है। फाइलों में दबे आवेदन और दफ्तरों के चक्कर काटते लोग हमारी व्यवस्था की सच्चाई को उजागर करते हैं।
समाज की भूमिका भी उतनी ही अहम है। हर समस्या को सिर्फ सरकार पर छोड़ देना हमारी जिम्मेदारी से बचना है। जब तक आम नागरिक कमजोर की आवाज़ नहीं बनेगा, तब तक इंसानियत अधूरी रहेगी। मानवता नीतियों से नहीं, बल्कि नजरिए और नीयत से जीवित रहती है।
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आज जरूरत है कि शासन-प्रशासन अधिक संवेदनशील बने, समाज जागरूक हो और हर व्यक्ति अपने स्तर पर इंसानियत निभाए। क्योंकि जब सुनने वाला होगा, तभी दबे हुए शब्द आवाज़ बन पाएंगे। मानवता मरी नहीं है, वह आज भी उम्मीद की तरह सांस ले रही है।
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