✍🏻•कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
वैसे तो भारत में आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस उत्तरोत्तर प्रभावी होता जा रहा है और उसके सकारात्मक व नकारात्मक दोनों ही पक्ष देखने को मिल रहे हैं । वैज्ञानिक प्रगति जहाँ एक ओर विकास की रचनात्मकता का यथार्थ सिद्ध करती है वहीं इसके नकारात्मक पहलू भी बराबर सामने आते जा रहे हैं। एक ओर परमाणु शक्ति का फ़ायदा विकास कार्यों में मिल रहा है तो दूसरी ओर इसी शक्ति का विध्वंस का भयावह रूप प्रस्तुत कर रहा है । चन्द्रयान-3 की सफलता और रुस-यूक्रेन तथा फ़िलिस्तीन-इज़रायल युद्ध इसके नवीनतम व प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
इस दृष्टिकोण से पत्रकारिता का निष्पक्ष व तटस्थ रहना बहुत ही कारगर सिद्ध होता है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पत्रकारिता यदि निष्पक्ष है तो लोकतंत्र के अन्य तीनों उत्तरदायी स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका हर पल सतर्क होकर अपना उत्तरदायित्व निभाते हैं और फलस्वरूप लोकतंत्र दिन प्रतिदिन मज़बूत होता जाता है।
परंतु यह सोचने को मजबूर करता है कि क्या मात्र एआई व चैट जीपीटी से भारत की प्रगति के सकारात्मक व नकारात्मक पहलुओं का आँकलन किया जा सकता है ? जब देश के 81 करोड़ लोगों को अगले पाँच साल तक फ्री राशन देने के लिए भारत सरकार गारंटी देने को बाध्य है, उन्हीं लोगों को ग़रीबी की रेखा के नीचे रहने की वजह से देश और प्रदेशों में तमाम योजनायें सरकारों को चलानी पड़ रही हैं और यह समयावधि हर बार सालों साल आगे बढ़ानी पड़ रही है तो क्या गारंटी है कि ये 81 करोड़ लोग अगले पाँच वर्ष में ग़रीबी रेखा से निकल कर ऊपर आ जाएँगे ? इतना ही नहीं इस तरह की अनेकों योजनायें कांग्रेस सरकार के बीस सूत्री कार्यक्रम के जमाने से चलती आ रही हैं परंतु न ग़रीबी कम हुई और न ग़रीब !
आज भी सार्वजनिक स्थानों पर बैठे हुये भिखारी पूरे भारत में मिलते हैं वो भी करोड़ों में और वो इन 81 करोड़ के अतिरिक्त हैं, जिनकी शायद जनगणना कभी होती ही नहीं।
यदि मीडिया निष्पक्ष पत्रकारिता कर रहा है तो इस पर विशेष आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस की ज़रूरत है साथ ही इस पर विशेष शोध की ज़रूरत है कि आज़ादी के 75 साल बाद भी भारत में ऐसी योजनाओं, तरह तरह के आरक्षण आदि की निरंतरता क्यों बनी है। देश की जनता बिजली, पानी, सड़क, सीवर और राशन की मूलभूत आवश्यकताओं से क्यों नहीं उबर पा रही है?
कहीं इस सबका कारण यह तो नहीं है कि देश में कुछ प्रतिशत लोगों के पास देश की संपत्ति का 90 प्रतिशत भाग उद्योग और वाणिज्य के रूप में अधिकृत है और 90 प्रतिशत शेष लोगों के पास देश की मात्र दस प्रतिशत संपत्ति में गुज़ारा करना पड़ रहा है ? इस पर भी विशेष शोध की आवश्यकता है। यह भी विचारणीय है कि जिन दस प्रतिशत के पास देश का 90 प्रतिशत वैभव है क्या उसका कोई फ़ायदा उन 90 प्रतिशत को मिल रहा है जिनके पास कुछ नहीं है। देश की बेरोज़गारी, महँगाई व ग़रीबी मिटाने में इन दस प्रतिशत उद्योगपतियों की कितनी भागीदारी है यह भी सुनिश्चित होना आवश्यक है। शिक्षा, चिकित्सा और सामाजिक विकास में इनका कितना योगदान है यह भी तय होना आवश्यक है।
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