ज्ञान, कला और बुद्धि की अधिष्ठात्री माँ सरस्वती


भारतीय सनातन संस्कृति में ज्ञान को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, और ज्ञान की इस दिव्य चेतना की अधिष्ठात्री देवी हैं माँ सरस्वती। वे केवल विद्या की देवी नहीं, बल्कि कला, संगीत, वाणी, सृजन और विवेक की भी प्रतीक हैं। माँ सरस्वती का स्मरण हमें अज्ञान के अंधकार से निकालकर विवेक, सत्य और सौंदर्य के प्रकाश की ओर ले जाता है।

श्वेत वस्त्रधारिणी, वीणा वादिनी माँ सरस्वती का स्वरूप अत्यंत शांत, सात्त्विक और प्रेरणादायक है। उनका श्वेत वर्ण पवित्रता और निर्मलता का प्रतीक है, जबकि वीणा सृजनात्मक अभिव्यक्ति और संगीत के माध्यम से आत्मा की भाषा को दर्शाती है। उनके हाथों में पुस्तक ज्ञान की निरंतर साधना का संकेत देती है और हंस विवेक का प्रतीक है—जो दूध और पानी को अलग करने की क्षमता रखता है, ठीक वैसे ही जैसे मनुष्य को सत्य और असत्य में भेद करना चाहिए।

माँ सरस्वती की पूजा विशेष रूप से विद्यार्थियों, शिक्षकों, कलाकारों, लेखकों और साधकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। बसंत पंचमी के दिन होने वाली सरस्वती पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रति श्रद्धा और समर्पण का उत्सव है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, संवेदनशीलता और सामाजिक चेतना का आधार भी है।

आज के भौतिक और प्रतिस्पर्धात्मक युग में माँ सरस्वती का संदेश और भी प्रासंगिक हो गया है। जब ज्ञान का उपयोग केवल स्वार्थ के लिए होने लगे, तब विवेक और नैतिकता का संतुलन बिगड़ जाता है। माँ सरस्वती हमें सिखाती हैं कि सच्चा ज्ञान वही है जो समाज को जोड़ता है, मन को विनम्र बनाता है और मानवता का कल्याण करता है।

अतः माँ सरस्वती की पूजा केवल दीप, पुष्प और मंत्रों तक सीमित न रहकर, जीवन में ज्ञान, कला और सद्बुद्धि को आत्मसात करने का संकल्प होनी चाहिए। जब मनुष्य अपने भीतर विवेक, रचनात्मकता और सत्यनिष्ठा को जाग्रत करता है, तभी माँ सरस्वती की सच्ची आराधना पूर्ण होती है।

माँ सरस्वती हम सभी को सद्बुद्धि, सृजनशीलता और ज्ञान के पथ पर निरंतर अग्रसर होने की शक्ति प्रदान करें।

rkpNavneet Mishra

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