साधना के शाक्त, वैष्णव और शैव स्तरों की समान पारमार्थिक महत्ता पर जोर

आनंद मार्ग का प्रथम संभागीय त्रिदिवसीय सेमिनार शुरू

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। आनंद मार्ग प्रचारक संघ गोरखपुर द्वारा आयोजित प्रथम संभागीय त्रिदिवसीय सेमिनार का शुभारंभ शुक्रवार को दक्षिणी बेतिया हाता स्थित आयोजन स्थल पर हुआ। मुख्य प्रशिक्षक आचार्य सिद्ध विद्यानंद अवधूत ने आनंद मार्ग के प्रवर्तक आनंदमूर्ति की प्रतिकृति पर माल्यार्पण कर सेमिनार का उद्घाटन किया।
उद्घाटन सत्र में “साधना” विषय पर बोलते हुए आचार्य सिद्ध विद्यानंद अवधूत ने कहा कि आनंद मार्ग की साधना पद्धति के तीन प्रमुख स्तर—शाक्त, वैष्णव और शैव—का पारमार्थिक मूल्य समान है। किसी एक स्तर को अलग करके आनंद मार्ग को पूर्ण रूप से नहीं समझा जा सकता।
उन्होंने बताया कि साधक की यात्रा शाक्त साधना से आरंभ होकर शैव भाव की ओर अग्रसर होती है। प्रत्याहार योग के माध्यम से साधक की आंतरिक उन्नति होती है और वह जगत सेवा की दिशा में प्रवृत्त होता है। वैष्णव स्तर में निःस्वार्थ भक्ति का विकास होता है, जबकि शैव स्तर ज्ञानस्वरूप अवस्था का प्रतीक है। शाक्त स्तर में ज्ञान और कर्म की प्रधानता, वैष्णव स्तर में कर्म और भक्ति तथा शैव स्तर में पूर्णतः ज्ञान भाव निहित है।
प्रत्याहार साधना के चार स्तर—यतमान, व्यतिरेक, एकेन्द्रिय और वशीकार—का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वशीकार अवस्था में साधक पूर्णतः परमात्मा की शरण में होता है। इस अवस्था में मन आत्मा के नियंत्रण में आ जाता है, जिससे साधक 50 मूल वृत्तियों पर नियंत्रण प्राप्त करता है।
आचार्य ने मत और पथ के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि मत देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं, जबकि पथ एक ही होता है। अनेक मत हो सकते हैं, लेकिन परमगति का मार्ग एकमात्र है—परमपुरुष से मिलन। उन्होंने ब्रह्मचक्र के माध्यम से आनंद मार्ग को वह त्रिज्या बताया, जो सभी जीवों को केंद्र स्थित पुरुषोत्तम से जोड़ती है।
सेमिनार में आचार्य मेघदीपानंद अवधूत, आचार्य धीरजानंद अवधूत, पुण्यजीतानंद अवधूत, आचार्य अधिष्ठानंद अवधूत, आचार्य जगदात्मानंद, आचार्य राघवानंद अवधूत, आचार्य वल्लभानंद अवधूत, आचार्य सिद्धानंद अवधूत, अवधुतिका आनंद प्रसन्ना, आनंद आदिति, आनंद वेदीता आचार्या सहित विभिन्न जिलों से आए सैकड़ों अनुयायी उपस्थित रहे।

rkpNavneet Mishra

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