बिहार/पटना (राष्ट्र की परम्परा)
गिनती शुरू होते ही एनडीए ने शुरुआती बढ़त पकड़ी है।
तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन को अपने पाले में कुछ सीटें मिलती दिख रही हैं, लेकिन स्थिति पूरी तरह उनके पक्ष में नहीं घूम पाई है।
अधिकांश सर्वेक्षणों एवं एग्जिट पोल ने एनडीए को 120 से 150 सीटों के बीच आने की संभावना जताई है, जबकि महागठबंधन के लिए अनुमान 70-100 सीटों के आसपास रहे हैं।
मतदान में भागीदारी भी रिकॉर्ड रही — कुल वोटिंग लगभग 67% के आसपास रही।
कौन किस पर भारी पड़ता दिख रहा है
एनडीए की मजबूती:
एनडीए ने सोशल-वेलफेयर योजनाओं, अच्छे शासन (गुड गवर्नेंस) के संदेश और अपने मजबूत संगठन-जाल के माध्यम से अपनी पकड़ मजबूत की है। शुरुआती बढ़त इसके संकेत दे रही है कि वह इस बार अपने 2020 के प्रदर्शन से आगे निकलने का लक्ष्य रखेगा।
महागठबंधन की चुनौतियाँ:
महागठबंधन के लिए सीट-बंटवारे, गठबंधन-सामंजस्य और अपना देशी एजेंडा पूरे राज्य में मजबूती से पेश करना चुनौतिपूर्ण रहा है। जबकि कुछ क्षेत्रों में उनका जनाधार ज़ोर पकड़ रहा है, लेकिन यह उस तरह फैल नहीं पाया है जिससे एनडीए के खिलाफ बड़े दल के रूप में असर दिख सके।
वोट बैंक व क्षेत्रीय समीकरण:
बिहार में जातिगत, क्षेत्रीय व सामाजिक समीकरण का असर प्रत्यक्ष है। पिछड़े एवं अल्पसंख्यक वर्ग, पुरानी राजनीतिक धड़ाएं, तथा नए वोटर्स — इन सबका रुझान इस बार निर्णायक होगा। एनडीए को इन श्रेणियों में अनुशासन बनाए रखने में सफलता मिलती दिख रही है।
किसानी-क्षेत्र व आकांक्षाएँ:
ग्रामीण-क्षेत्र में बदलती आकांक्षाएँ, रोजगार-मुद्दा, शिक्षा-स्वास्थ्य से जुड़े वादे, ये सभी इस चुनाव में बड़े रोल निभा रहे हैं। महागठबंधन को इस मोर्चे पर ‘परिवर्तन’ का एजेंडा थामना था, लेकिन अपना पूरा ताप एवं विस्तार हासिल नहीं कर पाया है।
अभी तक की रुझान प्रारम्भिक है — गिनती जारी है, अंतिम परिणाम अभी तय नहीं। शुरुआती बढ़त समय-सापेक्ष बदल भी सकती है।
243 सीटों वाले विधानसभा में 122 सीटें सरकार बनाने के लिए न्यूनतम बहुमत की संख्या है।
यदि एनडीए ने 120+ सीटों की ओर बढ़त बनाई है, तो उसकी सरकार फिर से बनेगी; दूसरी ओर, महागठबंधन के लिए 100+ सीटें भी बड़ी सफलता मानी जाएँगी।
अंतिम परिणाम आने तक क्षेत्र-वार, विधानसभा-वार ट्रेंड्स पर नजर रखना ज़रूरी होगा — क्योंकि कुछ ज़िले, कुछ सीटें ‘स्विंग’ कर सकती हैं।
इस चुनाव परिणाम का असर सिर्फ राज्य-स्तर पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी देखा जा रहा है — यह देखें कि कैसे दोनों गठबंधन आगामी लोकसभा-चुनाव और राष्ट्रीय स्ट्रैटेजी के लिए इस परिणाम को पड़ाव मानेंगे।
इस वक्त की तस्वीर यह है कि एनडीए वर्तमान में आगे दिख रहा है, और ऐसा लगता है कि उसे इस बार वरीयता-विहीन जीत मिल सकती है। महागठबंधन के लिए यह ‘प्लान बी’ नहीं बल्कि ‘प्लान ए’ समय था — लेकिन फिलहाल वह एनडीए के मुकाबले पीछे नजर आ रहा है।
हालाँकि, राजनीतिक मुठभेड़ में आखिरी दौर तक सब खुला होता है। आने वाला समय बतायेगा कि बिहार का मतदाता किसे भरोसा देता है — और किस गठबंधन व कौन-से नेतृत्व पर भारी पड़ता है।
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