संस्कारविहीन शिक्षा एक अभिशाप- आचार्य शान्तनु महाराज

सिकंदरपुर/बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। सरयू तट स्थित श्री वनखंडी नाथ मठ, दूहा बिहरा में आयोजित राजसूय महायज्ञ अपने समापन की ओर है। इस महायज्ञ का आयोजन स्वत्वाधिकारी पूर्व मौनव्रती स्वामी ईश्वरदक्षस ब्रह्मचारी महाराज की कृपा एवं जनसहयोग से किया जा रहा है। कथा वाचक आचार्य शान्तनु महाराज ने इस अवसर पर भारतीय संस्कृति, संस्कार और जीवन मूल्यों पर विस्तृत चर्चा की। आचार्य शान्तनु ने कहा कि संस्कारविहीन शिक्षा समाज के लिए एक अभिशाप बन गई है। भारतीय संस्कृति में सोलह संस्कारों का विशेष महत्व है, लेकिन वर्तमान समय में इनकी उपेक्षा हो रही है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि संतों के कहने पर वेश्यागामी अजामिल ने अपने पुत्र का नाम नारायण रखा, जिसने अंत समय में उसे मोक्ष दिलाया। आचार्य ने रामायण के कई प्रसंगों के माध्यम से संस्कारों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भगवान राम ने अपने जीवन से आदर्श स्थापित किया। रामलला का जन्म, उनकी लीलाओं और गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त करने की घटना हमें यह सिखाती है कि जीवन में संस्कार और शिक्षा का संतुलन कितना जरूरी है। आचार्य ने कहा, “राम का अद्भुत रूप-सौंदर्य वर्णन मनोहारी है। वे मंगल के धाम हैं और अमंगल का हरण करने वाले हैं। माता कौशल्या द्वारा भोग लगाने के समय राम का विराट रूप दिखाना इस बात का प्रतीक है कि भगवान हर जगह उपस्थित हैं।”गुरु और शिष्य का महत्व- आचार्य ने कहा कि गुरु वही होता है, जो शिष्य को भगवान से मिलाने का माध्यम बने। उन्होंने कथा सुनाते हुए बताया कि जब शंकर जी को अयोध्या में प्रवेश से रोका गया, तो उन्होंने युक्ति से वहां प्रवेश किया। इस प्रसंग में यह संदेश है कि सच्चा गुरु अपने शिष्य को हर परिस्थिति में मार्गदर्शन देता है।समाज के पतन पर चिंता- वक्ता ने वर्तमान समाज में देवी-देवताओं का मजाक उड़ाने और अश्लील गीतों की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यह समाज को अधोगति की ओर ले जा रहा है। समय रहते इन प्रवृत्तियों पर नियंत्रण जरूरी है।संस्कार विहीन शिक्षा का दुष्प्रभाव- आचार्य ने कहा, “संस्कार विहीन शिक्षा समाज के लिए अभिशाप है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि माता-पिता कई संतानों को पालते हैं, लेकिन वही संतानें अपने माता-पिता की सेवा करने में असमर्थ रहती हैं। माता-पिता जीवित देवता हैं, और उनकी सेवा से सबकुछ संभव है।” आचार्य शान्तनु ने अंत में कहा कि शिक्षा और संस्कार का समावेश ही समाज को सही दिशा में ले जा सकता है। जो शिक्षा हमारे जीवन में नैतिक मूल्यों का संचार नहीं करती, वह शिक्षा अधूरी है। समाज को ऐसे प्रयास करने चाहिए, जो आने वाली पीढ़ियों को शिक्षा के साथ संस्कारों का पाठ भी पढ़ाएं।

Karan Pandey

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