गर्मी से केले के पौधों में होने वाले रोग से बचाने के लिए डॉ के एम सिंह ने दी जानकारी

बहराइच ( राष्ट्र की परम्परा) इस समय गर्मी बढ़ने से और गर्म हवाएं चलने से केले के पौधों को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर केले के बगीचों में जड़- तना वीविल के क्षति के लक्षण भी दिखाई पड़ रहे हैं। कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ के.एम. सिंह ने बताया कि केले के पौधे को बचाने के लिए किसानों को वायु अवरोधक पेड़ खेत के किनारों पर लगाना चाहिए या फिर ग्रीन नेट से ढकना चाहिए जिससे वातावरण ठंडा रहे और केले के पौधे सूखें नहीं। केले की सूखी पत्तियों से केले के बंच को ढक देना चाहिए जिससे कि केले के गुच्छे लू के थपेड़ों से बच सके। उन्होंने बताया कि गर्मी के दिनों में पानी का वाष्पीकरण बहुत तेज़ी से होता है। ऐसे में केले के पौधों के थालो में केले की सूखी पत्तियों या फसल अवशेष का इस्तेमाल करके पौधे में ज़्यादा देर तक नमी बनायी जा सकती है। केंद्र की पौध संरक्षण वैज्ञानिक डॉ. हर्षिता ने केले के जड़- तना वीविल के
जैविक नियंत्रण हेतु सुझाव दिए। उन्होंने बताया कि ये कीट केले के पौधों से निकलने वाले वाष्पशील गैसिय पदार्थों के प्रति आकर्षित होते हैं। अत: इस परिस्थिति में केले के एक पेड़ को दो बराबर भागों में फाड़े (45 से 50 से.मी. लम्बे)। इसके बाद फाड़े हुए तने ( सौ टुकड़े प्रति हे. की दर से) को इस प्रकार रखें की कटा हुआ भाग भूमि की तरफ हो जिससे प्रकाश सीधे कटे भाग पर न पहुँचे। इस स्थिति में कटे पौधों से निकलने वाले वाष्पशील गैसों के प्रति कीट आकर्षित होकर उप्पर आ जायेंगे और तब उन कटे हुए टुकड़ो को ब्युवेरिया बेसियाना 6-8 ग्राम/ लीटर पानी के मिश्रण में भिगोकर पुनः वहीं रख दें। रासायनिक नियंत्रण हेतु क्लोरपाईरीफॉस 2.5 एम. एल. प्रति लीटर पानी की दर से आवश्यकता अनुसार 2 से 3 स्प्रे 15 से 20 दिनों के अंतराल पर करें किसान।

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