दिशाहीन कर्म और अधूरा धर्म, समाज के लिए बड़ी चुनौती

कैलाश सिंह 

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। आज का समाज तेज़ी से प्रगति की ओर बढ़ रहा है, लेकिन दिशा के प्रश्न पर वह गंभीर संकट से गुजर रहा है। विकास, सफलता और उपलब्धियों की अंधी दौड़ में मनुष्य निरंतर कर्म तो कर रहा है, पर यह सोचने का समय नहीं निकाल पा रहा कि उसके कर्म किस दिशा में जा रहे हैं। यही कारण है कि कहा गया है—धर्म के बिना कर्म दिशाहीन हो जाता है और कर्म के बिना धर्म केवल शब्दों में सिमटकर अधूरा रह जाता है।

 

 

वर्तमान समय में हर ओर कर्म की सक्रियता दिखाई देती है। योजनाएं बन रही हैं, फैसले लिए जा रहे हैं और बड़े-बड़े निर्माण कार्य हो रहे हैं। लेकिन जब इन कर्मों में धर्म—अर्थात सत्य, नैतिकता, करुणा और न्याय—का अभाव होता है, तब वही कर्म समाज के लिए विनाशकारी सिद्ध होते हैं। भ्रष्टाचार, शोषण, हिंसा और सामाजिक विघटन ऐसे ही दिशाहीन कर्मों के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। धर्मविहीन कर्म समाज को आगे नहीं बढ़ाता, बल्कि उसे भीतर से खोखला कर देता है।

 

 

दूसरी ओर, धर्म का केवल उपदेशों, कर्मकांडों और प्रतीकों तक सीमित रह जाना भी उतना ही खतरनाक है। यदि धर्म व्यवहारिक जीवन में न उतरे और केवल प्रवचनों या नारों तक सिमट जाए, तो वह निष्प्रभावी हो जाता है। सच्चा धर्म वही है, जो कर्म के रूप में दिखाई दे—गरीब की सहायता में, अन्याय के विरोध में, सत्य के पक्ष में खड़े होने में और मानवता की रक्षा में।

 

 

इतिहास गवाह है कि जब-जब धर्म और कर्म का संतुलन बना है, तब समाज ने नई ऊंचाइयों को छुआ है। महापुरुषों और समाज सुधारकों ने धर्म को जीवन का आधार बनाया और कर्म को उसका माध्यम। उन्होंने केवल उपदेश नहीं दिए, बल्कि अपने आचरण और कर्मों से धर्म को जीवंत किया। यही कारण है कि वे आज भी समाज के लिए प्रेरणा बने हुए हैं।

 

 

आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि धर्म और कर्म को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे का पूरक मानकर अपनाया जाए। कर्म को धर्म का अनुशासन मिले और धर्म को कर्म का व्यवहारिक रूप। तभी व्यक्ति का जीवन संतुलित होगा, समाज न्यायपूर्ण बनेगा और राष्ट्र सशक्त होगा।

 

 

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि धर्म के बिना कर्म अंधी शक्ति है और कर्म के बिना धर्म खोखली भावना। दोनों का समन्वय ही सच्ची प्रगति, स्थायी शांति और सामाजिक समरसता की गारंटी है। यही संदेश आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता और सबसे बड़ी सच्चाई है।

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