विकास, संविधान और नागरिक जीवन: दूषित पेयजल ने उजागर की भारत की बुनियादी सच्चाई

यदि 2047 तक भारत को सचमुच विकसित राष्ट्र बनना है, तो उसे बुनियादी सुविधाओं को नीतिगत प्राथमिकता नहीं बल्कि नैतिक दायित्व मानना होगा – एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर विज़न 2047 के तहत भारत स्वयं को एक विकसित राष्ट्र और विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।बुनियादी ढांचे,डिजिटल गवर्नेंस, स्मार्ट सिटी, हाईवे, मेट्रो औद्योगिक गलियारों और वैश्विक निवेश के आंकड़े इस प्रगति का दावा करते हैं। किंतु इसी आधुनिक भारत में यदि नागरिक दूषित पेयजल जैसी मूलभूत सुविधा के अभाव में अपनी जान गंवा दें, तो यह केवल प्रशासनिक विफ़लता नहीं, बल्कि राज्य की नैतिक, संवैधानिक और मानवीय विफलता बन जाती है।1 जनवरी 2026 को इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों ने इसी विरोधाभास को उजागर कर दिया है,जहाँ एक ओर वर्ल्ड क्लास इंडिया की आकांक्षा है, वहीं दूसरी ओर नागरिक जीवन की बुनियादी सुरक्षा भी सुनिश्चित नहीं हो पा रही। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि,स्वच्छ पेयजल का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। दूषित पानी से हुई मौतें सीधे-सीधे इस अधिकार का हनन हैं।जब भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की बात करता है, तब ऐसी घटनाएँ यह प्रश्न उठाती हैं कि क्या विकास मानवाधिकारों की रक्षा के बिना संभव है?हाईकोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का संज्ञान यह स्पष्ट करता है कि यह मामला केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि संवैधानिक और मानवाधिकार उल्लंघन का है।न्यायपालिका की सक्रियता यह सुनिश्चित करने का प्रयास है कि राज्य अपने कर्तव्यों से पलायन न करे और नागरिकों के जीवन की कीमत राजनीतिक सुविधा के अनुसार न तय की जाए। 

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साथियों बात अगर हम इंदौर में हुई त्रासदी को समझने की करें तो, जो शहर लगातार कई वर्षों से राष्ट्रीयस्वच्छता सर्वेक्षण में देश का सबसे स्वच्छ शहर घोषित होता रहा है, वहां नववर्ष के पहले ही दिन दूषित पेयजल से मौतों की खबर ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया।यह घटना इसलिए और भी गंभीर हो जाती है क्योंकि इंदौर को अक्सर शहरी प्रबंधन, नगर निकाय दक्षता और जनभागीदारी का आदर्श मॉडल बताया जाता रहा है।यदि ऐसा शहर भी अपने नागरिकों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने में विफल हो जाए,तो यह प्रश्न केवल इंदौर का नहीं, बल्कि पूरे शहरी भारत की जल सुरक्षा रणनीति पर खड़ा होता है।घटना का केंद्र इंदौर का भागीरथपुरा क्षेत्र है, जहाँ पुलिस चौकी के शौचालय के ठीक नीचे से गुजर रही नर्मदा की मुख्य जल आपूर्ति पाइपलाइन में गंभीर रिसाव पाया गया। इस रिसाव के कारण सीवेज का गंदा पानी सीधे पेयजल लाइन में मिल गया और पूरे वार्ड में दूषित पानी की आपूर्ति होती रही।यह केवल एक तकनीकी खराबी नहीं थी,बल्कि प्रणालीगत लापरवाही का परिणाम भी होने की संभावना है।मीडिया में चल रही खबरों के अनुसार,स्थानीय नागरिकों द्वारा सैकड़ों बार पार्षद को शिकायतें की गईं, नगर निगम की 311 ऐप पर भी बार-बार शिकायत दर्ज कराई गई, परंतु हर बार केवल आश्वासन मिला, समाधान नहीं। यह स्थिति बताती है कि डिजिटल शिकायत तंत्र तब तक अर्थहीन है,जब तक उस पर संवेदनशील और समयबद्ध कार्रवाई न हो।मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि दूषित पानी पीने से ही लोग बीमार पड़े और उनकी मृत्यु हुई। वहीं कलेक्टर स्तरपर यह कहा गया कि डिटेल्ड रिपोर्ट और कल्चर टेस्ट के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।यह प्रशासनिक भाषा एक परिचित पैटर्न को दर्शाती है,पहले टालना, फिर जांच, फिर जिम्मेदारी तय करने में विलंब। जबकि वास्तविकता यह है कि जब सैकड़ों लोग अस्पतालों में भर्ती हों, 16 बच्चे प्रभावित हों और मौतों की संख्या बढ़ रही हो, तब प्रशासनिक सतर्कता नहीं बल्कि आपातकालीन जवाबदेही अपेक्षित होती है। 

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साथियों बात अगर हम मौतों के आंकड़ों पर विवाद: सत्य बनाम आधिकारिक संस्करण इसको समझने की करें तो, इस पूरे मामले में सबसे चिंताजनक पहलू मौतों कीसंख्या को लेकर सामने आया विरोधाभास है।हाईकोर्ट में सरकार की ओर से पेश की गई स्टेटस रिपोर्ट में अब तक केवल 4 मौतों की बात कही गई,जबकि मीडिया से ऐसी खबरें आ रही है क़ि ज़मीनी रिपोर्ट, मीडिया और अस्पतालों के आंकड़ों के अनुसार 15 लोगों की मृत्यु हो चुकी है।यह अंतर केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि राज्य की पारदर्शिता और नैतिक साहस का प्रश्न है। लोकतंत्र में जब सरकारें मौतों को कम करके दिखाने लगें, तो यह पीड़ितों के प्रति दूसरा अन्याय बन जाता है। न्यायपालिका और मानवाधिकार आयोग की भूमिका इस मामले में हाईकोर्ट द्वारा जनहित याचिका पर संज्ञान लेना और अगली सुनवाई की तिथि तय करना न्यायिक सक्रियता का संकेत है। वहीं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर मुख्य सचिव को नोटिस जारी करना इस बात की पुष्टि करता है कि यह मामला केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि मानवाधिकार उल्लंघन का भी है। 

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साथियों बात अगर हम इस त्रासदी को संवैधानिक रूप से समझने की करें तो, भारत का संविधान नागरिकों को केवल शासन की संरचना नहीं देता, बल्कि उन्हेंसम्मानपूर्ण सुरक्षित और गरिमामय जीवन का वचन देता है। अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार केवल सांस लेने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें स्वच्छ जल, स्वच्छ पर्यावरण और स्वास्थ्य का अधिकार भी निहित है। इंदौर में दूषित पेयजल से हुई मौतें इस संवैधानिक वचन के टूटने का प्रतीक हैं। यह घटना केवल एक नगर निगम या राज्य सरकार की विफलता नहीं, बल्कि राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी के उल्लंघन का गंभीर मामला है।स्वच्छ पेयजल:मूल अधिकार का अविभाज्य हिस्सा भारतीय न्यायपालिका ने समय- समय पर स्पष्ट किया है कि स्वच्छ जल का अधिकार, अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का अनिवार्य अंग है। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों में यह स्थापित किया गया है कि यदि राज्य नागरिकों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने में असफल रहता है, तो वह संवैधानिक कर्तव्यहीनता का दोषी है।इंदौर की घटना में, जहाँ सीवेज का पानी पेयजल आपूर्ति में मिला और प्रशासन शिकायतों के बावजूद निष्क्रिय रहा,वहाँ यह तर्क और भी सशक्त हो जाता है कि राज्य ने अपने संवैधानिक दायित्व का पालन नहीं किया।अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन: समानता और जीवन पर भी आघात क़ी ओर इशारा करता है 

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साथियों बात अगर हम राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ: संवेदना,आरोप और नैतिक परीक्षा इसको समझने की करें तो पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा इसे मुख्यमंत्री के लिए परीक्षा की घड़ी बताना और घोर प्रायश्चित की बात कहना इस घटना की नैतिक गंभीरता को रेखांकित करता है।वहीं लोकसभा में विपक्षी नेता द्वारा यह कहना कि साफ पानी अहसान नहीं, जीवन का अधिकार है, लोकतांत्रिक विमर्श को संवैधानिक धरातल पर लाता है।हालांकि,राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से परे यह प्रश्न अधिक गहरा है,क्या शासन व्यवस्था नागरिक जीवन को सर्वोच्च प्राथमिकता मान रही है, या केवल राजनीतिक प्रबंधन तक सीमित है? 

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साथियों बात अगर हम दूषित पानी और घातक बैक्टीरिया एक वैज्ञानिक चेतावनी को समझने की करें तो, विशेषज्ञों के अनुसार, सीवेज मिला पानी केवल गंदा नहीं बल्कि अत्यंत विषैला होता है। इसमें हैजा जैसे घातक बैक्टीरिया, मल-मूत्र से उत्पन्न रोगाणु, साबुन, डिटर्जेंट, केमिकल और कभी-कभी औद्योगिक अपशिष्ट भी शामिल होता है।जब यह मिश्रण पेयजल आपूर्ति में प्रवेश करता है, तो यह एक मौन जैविक हथियार बन जाता है, जिसका प्रभाव बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों पर सबसे अधिक पड़ता है। 

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साथियों बात अगर हम वॉटर विज़न 2047: नीति और ज़मीनी हकीकत का अंतर को समझने की करें तो, हाल ही में भोपाल में आयोजित वॉटर विज़न 2047 सम्मेलन में प्रधानमंत्री के 5 पी मॉडल,राजनीतिक इच्छाशक्ति, लोक वित्त, साझेदारी, जन भागीदारी और सतत प्रेरणा पर विस्तृत चर्चा हुई थीं।जल सुरक्षा के लिए रोडमैप तैयार करने की बातें हुईं थीं,परंतु इंदौर जैसी घटना यह दर्शाती है कि नीतिगत विमर्श और ज़मीनी क्रियान्वयन के बीच अभी भी गहरी खाई है। जब तक पाइपलाइन स्तर पर निगरानी, जवाबदेही और त्वरित सुधार तंत्र विकसित नहीं होंगे, तब तक वॉटर विज़न केवल दस्तावेज़ों में सिमटा रहेगा।

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साथियों बात कर हमअंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: विकसित देशों से भारत क्या सीख सकता है इसको समझने की करें तो, यूरोप, जापान और सिंगापुर जैसे देशों में पेयजल आपूर्ति को क्रिटिकल नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर माना जाता है। वहां जल आपूर्ति लाइनों की नियमित ऑडिट, सेंसर आधारित निगरानी, और किसी भी रिसाव पर त्वरित अलर्ट सिस्टम लागू हैं।भारत यदि 2047 तक वैश्विक नेतृत्व की आकांक्षा रखता है, तो उसे यह समझना होगा कि आर्थिक शक्ति का मूल्य तभी है जब नागरिक सुरक्षित स्वस्थ और सम्मानजनक जीवन जी सकें।

साथियों बात अगर हम  मीडिया, अभिव्यक्ति और सत्ता का व्यवहार इसको समझने की करें तो, इस प्रकरण में एक इंटरविनर द्वारा मीडिया पब्लिकेशन पर रोक की मांग और एक वरिष्ठ मंत्री द्वारा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सवालों पर असभ्य भाषा का प्रयोग करना लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए चिंताजनक संकेत हैं।सत्ता की परिपक्वता इस बात से मापी जाती है कि वह संकट के समय सवालों से डरती है या उनसे सीखती है। मीडिया पर अंकुश लगाने की सोच समस्या के समाधान के बजाय उसे दबाने की प्रवृत्ति को दर्शाती है। 

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अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन करें इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि विकसित भारत का अर्थ केवल जीडीपी नहीं हैं, इंदौर की जल त्रासदी हमें यह याद दिलाती है कि विकसित भारत का सपना केवल आर्थिक आंकड़ों, रैंकिंग और घोषणाओं से पूरा नहीं होता। उसका असली पैमाना यह है कि क्या हर नागरिक सुरक्षित पानी पी सकता है, बिना डर के जी सकता है, और राज्य पर भरोसा कर सकता है।यदि 2047 तक भारत को सचमुच विकसित राष्ट्र बनना है, तो उसे बुनियादी सुविधाओं को नीतिगत प्राथमिकता नहीं बल्कि नैतिक दायित्व मानना होगा। अन्यथा, ऐसी घटनाएँ न केवल जानें लेंगी, बल्कि राष्ट्र की आत्मा को भी घायल करती रहेंगी।

-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

Editor CP pandey

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