डिजिटल युग में अफवाहें, पेड प्रमोशन और डर आधारित मार्केटिंग: लोकतंत्र,
गोंदिया
इक्कीसवीं सदी का डिजिटल युग सूचना की अभूतपूर्व शक्ति लेकर आया है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स ने दुनिया को जोड़ा है, लेकिन इसके साथ ही अफवाहों और फेक न्यूज का संकट भी तेजी से बढ़ा है। आज यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर लोकतंत्र, जनस्वास्थ्य, सामाजिक सौहार्द और अंतरराष्ट्रीय स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी है।
मैं, एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी (गोंदिया, महाराष्ट्र), यह मानता हूँ कि अफवाहों का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि वे सच का रूप धारण कर लेती हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर वायरल सामग्री डर, नफरत और पूर्वाग्रह को बढ़ाती है, जिससे समाज का ताना-बाना कमजोर होता है।
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डिजिटल युग में अफवाहें: समाज और लोकतंत्र पर सीधा हमला
भारत जैसे विविधता-पूर्ण देश में भाषा, धर्म, जाति और राजनीतिक मतभेद पहले से मौजूद हैं। ऐसे में अफवाहें सामाजिक तनाव, सांप्रदायिक हिंसा और अविश्वास को जन्म देती हैं।
बीते वर्षों में व्हाट्सएप संदेशों और सोशल मीडिया पोस्ट के कारण भीड़ हिंसा, लिंचिंग और दंगे हुए, जो यह सिद्ध करता है कि फेक न्यूज अब केवल सूचना की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा का संकट बन चुकी है।
वैश्विक स्तर पर भी अफवाहों ने नस्लीय तनाव, युद्ध जैसी स्थितियों और कूटनीतिक संबंधों को प्रभावित किया है।
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डिजिटल युग में मिसिंग पर्सन्स की अफवाहें: भय बनाम तथ्य
हाल के समय में मुंबई और दिल्ली में मिसिंग पर्सन्स को लेकर फैली अफवाहें इसका बड़ा उदाहरण हैं।
दिल्ली में 2026 के शुरुआती दिनों में 800 से अधिक लोगों के लापता होने का दावा किया गया, जो सुनने में भयावह लगा।
लेकिन जब आँकड़ों का विश्लेषण किया गया तो सामने आया कि:
अधिकांश मामले पारिवारिक विवाद, स्वेच्छा से घर छोड़ने, परीक्षा या करियर तनाव, प्रेम संबंध या गलत रिपोर्टिंग से जुड़े थे
दिल्ली में रिकवरी रेट लगभग 77% है
यह आँकड़ा अंतरराष्ट्रीय महानगरों की तुलना में बेहतर है
पुलिस अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि मौजूदा आँकड़े पिछले वर्षों के औसत से भिन्न नहीं हैं। अफवाहों पर कानूनी सख्ती की चेतावनी के बाद ही माहौल शांत हुआ।
यह दर्शाता है कि अफवाहें वास्तविक संकट से अधिक डिजिटल रूप से निर्मित सामाजिक भय पैदा करती हैं।
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लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर फेक न्यूज का खतरा
चुनावों के दौरान फेक न्यूज मतदाताओं की सोच को प्रभावित करती है, उम्मीदवारों की छवि बिगाड़ती है और निष्पक्ष चुनाव पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
भारत सहित कई देशों में चुनावों के समय संगठित फेक न्यूज अभियानों और विदेशी हस्तक्षेप के प्रमाण सामने आए हैं।
यदि लोकतंत्र को सुरक्षित रखना है, तो फेक न्यूज को केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अनदेखा नहीं किया जा सकता।
जनस्वास्थ्य और अफवाहें: जानलेवा परिणाम
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कोविड-19 महामारी के दौरान पूरी दुनिया ने देखा कि कैसे झूठी सूचनाओं ने:
वैक्सीन को लेकर डर फैलाया
खतरनाक घरेलू नुस्खों को बढ़ावा दिया
स्वास्थ्य प्रणालियों पर अविश्वास पैदा किया
भारत सहित कई देशों में अफवाहों के कारण लोगों ने समय पर इलाज नहीं कराया, जिससे जान-माल की भारी क्षति हुई। जब अफवाहें जीवन और मृत्यु का प्रश्न बन जाएँ, तब उन्हें रोकना कानूनी आवश्यकता बन जाती है।
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पेड प्रमोशन और डर आधारित मार्केटिंग स्ट्रेटेजी
आज अफवाहों के पीछे केवल अज्ञानता नहीं, बल्कि व्यावसायिक हित भी काम कर रहे हैं।
कई सोशल मीडिया पेज, चैनल और इन्फ्लुएंसर्स जानबूझकर डरावनी सामग्री फैलाते हैं क्योंकि:व्यूज और एंगेजमेंट बढ़ता है।पेड प्रमोशन और ब्रांड डील्स मिलती हैं।डर को उत्पाद की तरह बेचा जाता है।यह एक नई डर आधारित मार्केटिंग स्ट्रेटेजी है, जो समाज की असुरक्षा का व्यावसायिक दोहन करती है।
मौजूदा कानून क्यों अपर्याप्त हैं?
भारत में आईटी एक्ट, भारतीय न्याय संहिता और अन्य कानूनों में कुछ प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन वे:विशिष्ट नहीं हैं,डिजिटल प्लेटफॉर्म की गति और पैमाने को ध्यान में रखकर नहीं बने,एल्गोरिदम आधारित कंटेंट प्रमोशन को नियंत्रित नहीं करते,इसीलिए एक विशेष और सख्त कानून की आवश्यकता है।
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फेक न्यूज एक्ट 2026: समय की मांग– फेक न्यूज एक्ट 2026 में यह स्पष्ट होना चाहिए कि:अफवाह, फेक न्यूज और भ्रामक सूचना की परिभाषा क्या है।जानबूझकर झूठी सूचना फैलाने पर सख्त दंड। डिजिटल प्लेटफॉर्म की कानूनी जिम्मेदारी तय हो। फॉरवर्ड लिमिट और कंटेंट मॉडरेशन बाध्यकारी बने।डिजिटल और मीडिया साक्षरता: सबसे मजबूत ढाल।केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है।स्कूल, कॉलेज और सामुदायिक स्तर पर यह सिखाना जरूरी है कि:खबर की सत्यता कैसे जाँची जाए
स्रोत की विश्वसनीयता कैसे परखी जाए।भावनात्मक और डर फैलाने वाली सामग्री से कैसे बचा जाए।जागरूक नागरिक ही अफवाहों के खिलाफ सबसे मजबूत सुरक्षा कवच हैं।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता
फेक न्यूज की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती।संयुक्त राष्ट्र, जी-20 जैसे मंचों पर साझा मानक, सूचना साझाकरण और संयुक्त नियामक ढाँचे की आवश्यकता है, ताकि वैश्विक स्तर पर इस संकट से निपटा जा सके।
निष्कर्ष
अफवाहें आज एक मौन लेकिन शक्तिशाली हथियार बन चुकी हैं, जो लोकतंत्र, जनस्वास्थ्य और सामाजिक सौहार्द को कमजोर कर रही हैं।
भारत सहित पूरी दुनिया को स्वीकार करना होगा कि मौजूदा कानूनी ढाँचे अपर्याप्त हैं।
फेक न्यूज एक्ट 2026, मजबूत प्लेटफॉर्म नियमन और व्यापक जन-जागरूकता—इन तीनों के समन्वय से ही इस संकट पर नियंत्रण संभव है।
यदि आज निर्णायक कदम नहीं उठाए गए, तो सूचना की आज़ादी का यह युग समाज के लिए सबसे बड़ा संकट बन सकता है।
संकलनकर्ता / लेखक
कर विशेषज्ञ स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि, संगीत माध्यमा, सीए (एटीसी)
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया, महाराष्ट्र
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