संस्कार बनाम रूढ़िवादिता: परंपरा के नाम पर बढ़ता सामाजिक बोझ, क्यों जरूरी है बदलाव की स्वीकार्यता

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। समाज में संस्कार हमेशा से नैतिकता, मानवता और सद्भाव के आधार माने गए हैं। यह वे मूल्य हैं जो व्यक्ति को सही दिशा दिखाते हैं और पीढ़ियों को जोड़ने का काम करते हैं। लेकिन चिंताजनक तथ्य यह है कि समय के साथ संस्कारों की आड़ में रूढ़िवादिता तेज़ी से बढ़ती जा रही है। परिणामस्वरूप कई मूल मानवीय मूल्यों पर परंपरा के नाम पर बोझ लाद दिया गया है।

डॉ. सतीश पाण्डेय का मानना है कि संस्कार सरलता, करुणा और विवेक पर आधारित होते हैं, जबकि रूढ़िवादिता कठोर, तर्कहीन और भय पर आधारित होती है। अक्सर दोनों के बीच फर्क न कर पाने की वजह से समाज अच्छे और बुरे के बीच अंतर करने की क्षमता खोने लगता है। कई बार आवश्यक सवालों को संस्कार विरोधी कहकर रोक दिया जाता है, जबकि ज़रूरी बदलावों को परंपरा पर हमला बताकर दबा दिया जाता है।

लड़कियों की शिक्षा और स्वतंत्रता को ‘संस्कार’ बताकर रोका जा रहा है

आज भी कई परिवारों में लड़कियों की शिक्षा, उनकी स्वतंत्रता, विचारों की आज़ादी और विवाह से जुड़े निर्णयों पर रोक को संस्कारों का नाम दे दिया जाता है। यह स्थिति जाति, समुदाय और सामाजिक वर्गों में और भी स्पष्ट दिखाई देती है, जहां दशकों पुरानी मान्यताएं बिना किसी तर्क के ढोई जा रही हैं।

संस्कार प्रगति का विरोध नहीं करते, रूढ़िवादिता करती है

डॉ. पाण्डेय के अनुसार, संस्कार समाज को आगे बढ़ाते हैं, जबकि रूढ़िवादिता उसे जकड़ कर रखती है।
संस्कार इंसान को— विवेक, करुणा, सम्मान, जिम्मेदारी जैसे गुण सिखाते हैं।
वहीं रूढ़िवादिता वह सोच है जो सवाल पूछने की क्षमता को खत्म कर देती है।

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परंपराओं का बदलना स्वाभाविक है

समय के साथ जो परंपराएं समाज के हित में उपयोगी नहीं रहीं, उनका बदलना अनिवार्य है। परंपरा वही तक उपयोगी है, जब तक वह मानव को ऊपर उठाए। संस्कार मानवता को पोषित करते हैं, जबकि रूढ़िवादिता भय और बंधनों में जकड़ती है।

डॉ. पाण्डेय का कहना है कि विज्ञान, आधुनिकता और नए विचारों को अपनाने के साथ भी हम अपने मूल्यों को सुरक्षित रख सकते हैं—बशर्ते हम यह स्वीकार करें कि बदलाव विनाश नहीं, बल्कि विकास की प्रक्रिया है।

आने वाली पीढ़ियों के लिए जरूरी है रूढ़िवादिता की बेड़ियां तोड़ना

यदि समाज संस्कारों की आड़ में रूढ़िवादिता को बढ़ावा देता रहेगा, तो नई पीढ़ियाँ स्वतंत्र रूप से सोच नहीं पाएंगी और न ही प्रगति कर सकेंगी। जरूरत है कि बोझिल परंपराओं के बजाय मूल्यों को संरक्षित किया जाए। संस्कारों को जीवित रखते हुए रूढ़िवादिता को खत्म करना ही समय की मांग है।

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Karan Pandey

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