आदर्श गौ सदन बना बदहाली का प्रतीक: 26 गोवंश संकट में, बीमार पशुओं को 10 दिन से नहीं मिला इलाज
डॉ सतीश मिश्र
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। पनियरा विकास खंड के चन्दन चाफी गांव स्थित आदर्श जिला पंचायत गौ सदन आज अपनी दुर्दशा के कारण सवालों के घेरे में है। कागजों में “आदर्श” कहलाने वाला यह गौ सदन जमीनी हकीकत में अव्यवस्थाओं और लापरवाही का केंद्र बन चुका है। यहां रह रहे 26 गोवंशों का जीवन संकट में है, जबकि जिम्मेदार विभाग और प्रशासनिक तंत्र मूकदर्शक बना हुआ है।
गौ सदन की स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि यहां मौजूद दो गोवंश पिछले 10 दिनों से बीमार हैं, लेकिन बार-बार सूचना देने के बावजूद अब तक कोई पशु चिकित्सक मौके पर नहीं पहुंचा। केयरटेकर भगवत पासवान और गीता देवी के अनुसार उन्होंने कई बार संबंधित अधिकारियों को फोन कर स्थिति से अवगत कराया, लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही मिला, जमीन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इससे पशुओं की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है।
गौ सदन में मूलभूत सुविधाओं का घोर अभाव साफ दिखाई देता है। बीते 12 वर्षों से यहां बिजली की स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकी है। जो सोलर सिस्टम लगाया गया था, वह भी लंबे समय से खराब पड़ा है। परिणामस्वरूप रात के समय अंधेरे में ही केयरटेकरों को पशुओं की देखभाल करनी पड़ती है, जो न केवल कठिन बल्कि जोखिम भरा भी है।
चारे की स्थिति भी अत्यंत चिंताजनक है। गोवंशों को न तो पर्याप्त हरा चारा मिल रहा है और न ही संतुलित पोषक आहार। केवल चोकर और सूखे भूसे के सहारे पशुओं का पालन किया जा रहा है, जिससे उनकी सेहत पर गंभीर असर पड़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार संतुलित आहार की कमी से पशु जल्दी बीमार पड़ सकते हैं और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कमजोर हो जाती है।
पानी की व्यवस्था भी बदहाल है। गौ सदन में मौजूद पानी की टंकी दूषित हो चुकी है, जिससे पशुओं को नल के पानी से प्यास बुझानी पड़ रही है। यह स्थिति पशुओं के स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन सकती है, क्योंकि दूषित पानी से संक्रमण फैलने की आशंका बनी रहती है।
इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू यहां कार्यरत केयरटेकरों का है। भगवत पासवान और गीता देवी को पिछले तीन महीनों से मानदेय नहीं मिला है। आर्थिक तंगी के बावजूद वे किसी तरह अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे हैं, लेकिन लगातार भुगतान न मिलने से उनके सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
जिला पंचायत से जुड़े संदीप सिंह ने इस बदहाल व्यवस्था के पीछे बजट की कमी को जिम्मेदार ठहराया है। उनका कहना है कि विभाग को समय पर धनराशि उपलब्ध नहीं हो पाती और प्रति पशु 50 रुपये प्रतिदिन की दर मौजूदा महंगाई के हिसाब से बेहद कम है। ऐसे में गौ सदन का संचालन सुचारू रूप से करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
हालांकि ग्रामीण इस तर्क से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि 26 पशुओं के हिसाब से प्रतिदिन लगभग 1300 रुपये और महीने में करीब 39 हजार रुपये की राशि बनती है। इसके बावजूद गौ सदन की हालत दयनीय होना गंभीर अनियमितताओं और प्रबंधन की विफलता की ओर संकेत करता है।
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और गौ सदन की व्यवस्थाओं को तत्काल सुधारा जाए। उनका कहना है कि यदि जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यहां मौजूद गोवंशों की जान पर बन सकती है।
यह मामला न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि पशु संरक्षण के दावों पर भी सवाल खड़े करता है। “आदर्श” गौ सदन की यह स्थिति सिस्टम की सच्चाई को सामने लाती है, जहां योजनाएं कागजों में सफल दिखाई देती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनकी हालत बेहद चिंताजनक होती है।
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