भाजपा बनी हिंदू महासभा : राजेन्द्र शर्मा का तीखा राजनीतिक विश्लेषण

भाजपा बनी हिंदू महासभा — यह कथन केवल एक राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि आज की भारतीय राजनीति की दिशा पर एक गंभीर सवाल है। भाजपा के पर्ची से निकले अध्यक्ष (कार्यकारी) नितिन नबीन ने दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय में कुर्सी संभालते ही जब ‘सब का साथ, सब का विकास’ की बात दोहराई, तो यह वाक्य अपने ही राजनीतिक परिवेश में असहज और खोखला प्रतीत हुआ।
वास्तविकता यह है कि भाजपा बनी हिंदू महासभा की छवि अब किसी आलोचक की कल्पना नहीं, बल्कि पार्टी के आचरण और बयानबाजी से निर्मित सच्चाई बन चुकी है। 2019 के बाद से ‘सब का साथ, सब का विकास’ का नारा औपचारिक दस्तावेजों में भले मौजूद हो, लेकिन व्यवहार में यह लगभग अदृश्य हो चुका है। जिस तरह कभी ‘गांधीवादी समाजवाद’ भाजपा की मूल विचारधारा बताया गया था और आज वह केवल इतिहास के पन्नों में सिमट गया है, उसी तरह यह नारा भी अब केवल बचाव के औजार के रूप में बचा है।

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राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद संघ-भाजपा ने जिस तरह पूरे श्रेय को राजनीतिक हथियार में बदला, उसके बाद भाजपा बनी हिंदू महासभा की प्रक्रिया और तेज हो गई। अल्पसंख्यकों के प्रति व्यवहार, मुस्लिम-विरोधी बयानबाजी और धार्मिक प्रतीकों का चुनावी इस्तेमाल अब अपवाद नहीं, बल्कि रणनीति बन चुका है।
नितिन नबीन का राजनीतिक सफर बिहार से जुड़ा है, जहां नीतीश कुमार जैसे सहयोगी के कारण भाजपा को अब भी खुली सांप्रदायिक भाषा पर संयम रखना पड़ता है। शायद यही कारण है कि नए अध्यक्ष के मुंह से ‘सब का साथ’ निकल गया, लेकिन यह उस जगह की याद भर दिलाता है, जिसे भाजपा काफी पहले छोड़ चुकी है।
तमिलनाडु और बंगाल : जहां भाजपा बनी हिंदू महासभा की प्रयोगशाला दिखी
2025 के अंत तक भाजपा किस वैचारिक मुकाम पर पहुंच चुकी है, इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल हैं। ये वे राज्य हैं जहां अब तक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोई मजबूत परंपरा नहीं रही। लेकिन भाजपा बनी हिंदू महासभा की राजनीति के लिए यही सबसे बड़ा ‘चैलेंज’ और ‘अवसर’ दोनों हैं।
तमिलनाडु के मदुरै जिले की तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी को ‘दक्षिण की अयोध्या’ बताकर वहां कृत्रिम धार्मिक विवाद खड़ा किया गया। जहां मंदिर, दरगाह और जैन गुफाएं सदियों से सह-अस्तित्व का प्रतीक रही हैं, वहीं संघ-भाजपा ने दरगाह को मंदिर साबित करने का अभियान छेड़ दिया। यह स्पष्ट करता है कि भाजपा बनी हिंदू महासभा की राजनीति किसी ऐतिहासिक सत्य पर नहीं, बल्कि तनाव पैदा करने की क्षमता पर निर्भर है।
इसी तरह पश्चिम बंगाल में बाबरी मस्जिद बनाने की एक भड़काऊ घोषणा को बहाना बनाकर ‘सामूहिक गीता पाठ’ के नाम पर मुस्लिम-विरोधी गोलबंदी की गई। इस आयोजन के दौरान एक मुस्लिम फेरीवाले पर हमला और उसके बाद आरोपियों का राजनीतिक अभिनंदन इस बात का प्रमाण है कि भाजपा बनी हिंदू महासभा केवल भाषणों तक सीमित नहीं, बल्कि सड़क पर उतर चुकी है।
गांधीवादी समाजवाद से हिंदू महासभा तक
1980 में भाजपा ने खुद को गांधीवादी समाजवाद से जोड़ने का प्रयास किया था। लेकिन 1988 में पालमपुर अधिवेशन से लेकर बाबरी मस्जिद आंदोलन और फिर मोदी युग तक आते-आते पार्टी लगातार सांप्रदायिक ढलान पर फिसलती चली गई। वाजपेयी दौर में जो ‘तिनके की ओट’ बची थी, वह भी अब हट चुकी है।
मोदी के तीसरे कार्यकाल में भाजपा बनी हिंदू महासभा कहना किसी अतिशयोक्ति से अधिक, एक राजनीतिक निष्कर्ष बनता जा रहा है। जब चुनाव आयोग से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक धर्मनिरपेक्षता के सवाल पर मौन साधे हुए हों, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या भाजपा को अब औपचारिक रूप से अपना नाम बदलकर हिंदू महासभा नहीं रख लेना चाहिए?

Editor CP pandey

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