बलिया (राष्ट्र की परम्परा)
1942 का अगस्त महीना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने ‘भारत छोड़ो’ का नारा दिया, तब पूर्वांचल की वीरभूमि बलिया ने इस आह्वान को सबसे पहले और सबसे प्रभावी रूप में स्वीकार किया। इस धरती ने न केवल अंग्रेजी सत्ता को खुली चुनौती दी, बल्कि पूरे जिले को एक समय के लिए स्वतंत्र गणराज्य का स्वरूप भी दे दिया।
9 अगस्त 1942 को बलिया के साहसी युवक सूरज प्रसाद (आयु मात्र 15 वर्ष) ने सेंसरशिप के बावजूद एक हिंदी समाचार पत्र के माध्यम से गांधीजी समेत अन्य नेताओं की गिरफ्तारी की खबर उमाशंकर सिंह तक पहुँचाई। सूरज प्रसाद ने भोपा बजाकर पूरे जनपद को आंदोलन के लिए तैयार किया। अगले ही दिन, 10 अगस्त की सुबह, उमाशंकर सोनार और उनके साथियों ने ओक्डेनगंज चौकी के पास क्रांति का शंखनाद किया। यह जुलूस नगर परिक्रमा करता हुआ चौक तक पहुँचा और एक विशाल सभा में बदल गया।
12 अगस्त को आंदोलन ने पूरे जिले को अपनी गिरफ्त में ले लिया। स्कूल के बच्चों के जुलूस पर अंग्रेजी पुलिस ने लाठीचार्ज किया। इससे जनता का गुस्सा और भड़क उठा।
13 अगस्त को बलिया कचहरी पर पहली बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया।
14 अगस्त को महिलाओं और छात्राओं ने भी आंदोलन का मोर्चा संभाल लिया। बाँसडीह में छात्रों का जुलूस कांग्रेस कमेटी के दफ्तर तक पहुँच गया। 15 अगस्त को जिलेभर में क्रांतिकारियों ने एकजुट होकर विशाल प्रदर्शन किया। हजारों की संख्या में लोग ‘भारत छोड़ो’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे लगाते हुए सुरेमनपुर रेलवे स्टेशन पहुँचे और अंग्रेजों की हड़बड़ी में रेल पटरियाँ उखाड़ डाली 16 अगस्त को बलिया की वीरांगनाओं ने जुलूस निकाला। अंग्रेजों ने लोहापट्टी में गोली चला दी, जिसमें 9 क्रांतिकारी शहीद हो गए। चितबड़ागाँव रेलवे स्टेशन को आग के हवाले कर दिया गया। नरही थाने के थानेदार ने स्वयं तिरंगा फहराया। सहतवार और रसड़ा में भी थाना, डाकखाना और रेलवे स्टेशन जनता ने फूंक डाले। 17 अगस्त को बाँसडीह तहसील पर जनता का कब्जा हो गया। 18 अगस्त को बाँसडीह व रेवती के थाने जला दिए गए। लेकिन बैरिया की घटना इतिहास का अनोखा अध्याय बन गई। हजारों क्रांतिकारियों के साथ करीब 50 महिलाएँ भी बैरिया थाने पर एकत्र हुईं। अंग्रेज थानेदार ने गोली चलाने का आदेश दिया, जिसमें 19 लोग शहीद हो गए। इसी दौरान 18 वर्षीय वीर कौशल कुमार ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना थाने की छत पर चढ़कर तिरंगा फहरा दिया। तभी अंग्रेज सिपाही महमूद खाँ ने गोली मार दी। वीर कौशल कुमार तिरंगा लिए लहूलुहान होकर शहीद हो गए। यह दृश्य आज भी स्वतंत्रता संग्राम की अमर गाथा के रूप में याद किया जाता है। 19 अगस्त 1942 को अंग्रेजी हुकूमत की नींव बलिया में हिल गई। क्रांतिकारियों ने जेल का फाटक तोड़कर पं. चित्तू पांडेय, राधामोहन सिंह, पं. महानंद मिश्र, विश्वनाथ चौबे सहित कई क्रांतिकारियों को मुक्त कर दिया।
कुछ दिनों के लिए बलिया स्वतंत्र गणराज्य बन गया, जहाँ जनता स्वयं अपने निर्णय ले रही थी और अंग्रेजी शासन पूरी तरह पस्त हो चुका था।
बलिया की इस क्रांति ने पूरे देश को झकझोर दिया। बलिदानी कौशल कुमार, सूरज प्रसाद, उमाशंकर सोनार, पं. चित्तू पांडेय और अज्ञात शहीदों के नाम आज भी इस धरती को “बगावत की जननी” बनाते हैं।
आजादी की इस जंग में बलिया ने यह साबित कर दिया कि जब जनता संगठित होकर उठ खड़ी होती है, तो साम्राज्य की जड़ें भी हिल जाती हैं। अगस्त क्रांति का यह गौरवशाली अध्याय बलिया की पहचान है और देश की आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरणा देता रहेगा। ।
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